Wednesday, December 19, 2007

शीर्षक रहित



विदेश आने के बाद जब पहली बार माँ को फ़ोन किया था, तब उन्होंने यह कविता लिख कर भेजी थी मुझे। कई वर्ष बीत गये इस बात को। वो पृष्ठ, जिस पर उनकी हाथ से लिखी हुई यह कविता है, पीला पड़ने लगा है। जहां से पन्ना फ़ोल्ड किया हुआ रखा था, अब छिजने लगा है। आज अपनी पुरानी डायरी खोली तो नीचे आ गिरा। पन्ने पर दिनांक है पर वर्ष नहीं है। शायद इस बात का प्रतीक है, कि किसी माँ की अपने पुत्र के लिये लिखी गयी पंक्तियां किसी वर्ष विशेष के लिये नहीं, अपितु आजन्म के लिये होती हैं। कविता को कोई शीर्षक भी नहीं दिया उन्होंने। शायद किसी शीर्षक में समा नहीं पाईं उनकी भावनाएं।

एक आवाज़;
कहीं दूर से आती हुई,
स्वच्छंद आकाश के समस्त विस्तार को
अपने में समेटे हुए
शून्य की गहराई से उभरती हुई
एक अकेले सांध्य तारे सी बैरागी,
यहीं कहीं
धरती के सब ओर
एकाएक झनझना कर छितर गयी है।

वह दूर की गूंजती आवाज़
अनायास
एक नन्ही सी कोंपल बन
मेरे हृदय की कगार पर
रोपित हो गयी है।

किसी मेरे अपने का
वह धुआं-धुआं सा स्वर
मेरे हर ओर अनेकों प्रश्न बन
बिखर गया है।

बीहड़ में भटकते
उस चातकी स्वर का
भविष्य निर्धारण करना
मेरे बस में नहीं

Saturday, November 24, 2007

नारायणी



स्वीकृति / अस्वीकृति के बीच
केवल
एक 'अ' का नहीं,
अपितु
असमान विचार-धाराओं का,
सोच का,
भावनाओं का गहन अंतर होता है।

इन दोनों के बीच,
पैंडुलम सा झूलता मन
व्यक्तिगत संस्कारों
और धारणाओं के आधार पर ही
निजी फ़ैसले करता है।

आज,
भ्रमित-मानसिकता के कारण
भयमिष्रित ऊहापोह में भटकते हुए
हम
भ्रूण हत्या की बात सोचते हैं
और
भूल जाते हैं
कि
अस्वीकृति की अपेक्षा
संभवत:
हमारी स्वीकृति ही
नारायणी बन
सुख, सौभाग्य की मृदु सुगंध से
हमारा घर-आँगन महकाने वाली हो।

'चेतना के स्वर', प 33

Saturday, November 3, 2007

दीपावली



रावण-वध कर, खेल खेल में,
रामायण को गा-गा कर।
ढोल-मंजीरे बजा बजा कर,
मन्दिर-मन्दिर जा जा कर॥

दीपावलियाँ जला-जला कर,
ही मनती दीवाली क्या?
घोर अमावस की यह रैना,
बन जाती उजियाली क्या?

प्रेम-पुष्प सानंद खिलें जब,
भाव-भाव से मिलते हैं।
द्वेष, ईर्ष्या रिक्त हुए मन,
सदभावों में खिलते हैं॥

जहाँ जलें हों दीप स्नेह के,
वहीं बसी खुशहाली है।
त्याग भावना जहाँ प्रवाहित,
वहीं सदा दीवाली है॥

आस-पास उद्वेग रहित हों,
दिशा-दिशा हो शांतमयी।
खिले-खिले हों सबके मुखड़े,
रहे न कोई क्लांतमयी॥

खुशियों भरी छलकती गागर,
सागर भरती प्याली हो।
हर घर हो पावन हरिमंदिर,
बारह मास दीवाली हो॥

बेल तामसी पग-पग बिखरी,
कहीं उलझ मत जाना तुम।
निज विवेक से चिंतन करते,
सब उलझन सुलझाना तुम॥

अकुलिष मन के दीप जहाँ हों,
रात वहीं मतवाली है।
सहज-सरल निर्मल हो जीवन,
वहीं सदा दीवाली है॥

"चेतना के स्वर", प्…29-30

Saturday, October 13, 2007

चाँदनी




चाँदनी रात-रानी सी खिलती गयी,
चंचल कस्तूरी-मृग सी मचलती गयी।
पत्ते-पत्ते पे हिम सी फिसलती गयी,
रात भर बन के चंदन महकती रही,
एक स्वप्निल झरोखे सी जगती रही।


चंद्रबाला धवल भावना की परी,
जाहनवी सी सरल कामना बन झरी।
बाँध लेती मधुर रेशमी वल्लरी,
झूमती हर दिशा में दमकती रही,
दीप्त मुक्तामणी सी विहँसती रही।


श्वेत मोदित लहर गुनगुनाती हुई,
ताल दर्पण में वह झिलमिलाती हुई।
कांत उपवन बनी महमहाती हुई,
रात में झीना आँचल फैलाती रही,
गीत मीठे सुरों के सुनाती रही।


नयन कोरों को अमृत से भर जाती थी,
देखते मेघ शावक को डर जाती थी।
फिर जो चुपके से मेरी सखी बन गयी,
प्रात: होने से पहले दगा दे गयी,
कौतुहल मेरा छल कर सज़ा दे गयी।


चाँदनी रात-रानी सी खिलती गयी,
चंचल कस्तूरी-मृग सी मचलती गयी।
पत्ते-पत्ते पे हिम सी फिसलती गयी,
रात भर बन के चंदन महकती रही,
एक स्वप्निल झरोखे सी जगती रही।


"चेतना के स्वर", प.63



Monday, September 24, 2007

ॠण-ग्रस्त



Story copyright: Sukirti Bhatnagar

Story source: "अहस्ताक्षरित संधिपत्र": A Compilation of Stories, 1994

भाग 1

भाग 2

भाग 3

ॠण-ग्रस्त: अंतिम भाग



वे नवंबर-दिसंबर के ठिठुरते हुए दिन थे जब मीना रात-रात भर माँ के सरहाने बैठी रहती थी। उन दिनों माँ का चलना-फिरना समाप्त्प्राय हो गया था। वह बिस्तर पर ही मल-मूत्र त्याग देती थीं लेटे-लेटे उनके शरीर पर घाव हो गये थे, जिन्हें मीना बड़े प्रेम से साफ़ करती। हर आधे घंटे में पाऊडर छिड़कती। माँ को नहलाना-धुलाना, गंदगी साफ़ करना कोई आसान काम नहीं था। धन्य थी वह, जिसने अपनों से भी बढ़ कर माँ की सेवा की।

आज रात दो बजे माँ ने प्राण त्याग दिये। तब से सुगंधा उदास, चुपचाप माँ के घुटनों के पास बैठी है। तभी डा. सक्सेना ने तंद्रा भंग की – “डा. सुगंधा, मेरे विचार से अब बहुत देर हो गयी है। शव को अधिक समय घर में नहीं रखना चाहिये। आपके रिश्तेदार तो अब तक पहुंचे नहीं। हमें चाहिये, हम माँ का अंतिम संस्कार कर दें।”

उसने सोचा अब किसी के आने या न आने से क्या फ़र्क पड़ता है। बोझिल कदमों से वह उठ खड़ी हुई और बोली – “चलिये डाक्टर साहब, माँ को ले चलें।”

वही शम्शान घाट जहाँ पिछले वर्ष ही तो अविनाश का संस्कार हुआ था। तब माँ थी, जिसकी छाती से लग कर वह फूट-फूट कर रोई थी। पर आज ऐसा कौन है जो रिसते हुए घावों को सहला सके।

माँ के अंतिम संस्कार से लौटी तो भाई-भाभी, जीजा जी, मेघा और अन्य रिश्तेदार पहुंच चुके थे। सभी उसे देख कर बिलख-बिलख कर रो पड़े। पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा, न रोई, न कुछ बोली। जाने कब तक शून्य में आँखें गड़ाये चुपचाप बैठी रही। उसकी अपनी तो बस एक माँ ही थी जो इस समय घर से बहुत दूर, धरती माँ की गोद में शाँत अकेली सोई हुई थी। शेष सब व्यर्थ है, दिखावा मात्र, उसका अन्तर्मन उसे कह रहा था।

प्यास से उसका गला सूख रहा था। उसने मीना को आवाज़ लगाई। शम्शान घाट जाने से पूर्व वह उसे कुछ आवश्यक निर्देश दे कर घर पर ही छोड़ गयी थी। पर अब वह कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। साथ वाले कमरे में गयी तो गोदरेज की अल्मारी खुली पड़ी थी। उसने झटपट ड्राअर खोली तो सभी पैसे, उसकी सोने की चेन और बालियाँ नादारद थीं, जिन्हें व्यस्तता के कारण वह अल्मारी की ड्राअर में रख कर भूल गयी थी। अब स्थिति उसके सामने स्पष्ट हो चली थी कि मीना ने ही ये सब चीज़ें उठाई होंगी क्योंकि उसके घर की कोई वस्तु तथा उसके रखने का स्थान मीना से छिपा नहीं रह गया था। वह घर के सदस्य के समान ही पिछले चार महीने से उसके घर में रहती रही थी और सुगंधा को उस पर पूरा विश्वास हो गया था।

अब तक कई अन्य लोग भी पीछे-पीछे कमरे में आ गये थे। बड़े भैया ने कहा कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिये क्योंकि मीना और उसका पति शहर से बाहर नहीं जा पाये होंगे।

सुगंधा की आँखों के सामने विगत वर्ष के वह सब दिन चरखी की तरह घूमने लगे जब माँ की संतान होने का कर्तव्य उनकी चारों संतानों को किसी न किसी कारण से, किसी न किसी क्षण एक बोझ प्रतीत हुआ। उस समय मीना ने माँ की अथक सेवा शुश्रूशा की। हाँ, पगार ले कर की, पर यही तो उसका कर्तव्य था। आज के स्वार्थी परिवेश में, जहां कोई नर्स अथवा सेवक पैसे ले कर भी, नाक-मुँह चढ़ा कर, केवल नाम-मात्र सेवा कर के चलते बनते हैं, मीना ने बड़ी लगन और नियमित रूप से, बिना माथे पर शिकन डाले, माँ को संभाले रखा। ऐसा तो स्वयं सुगंधा भी नहीं कर पाई थी।

उसने पल भर को भाई की आँखों में झाँका, फिर धीरे से बोली – “जाने दो भैया, जाने दो उसे। जिस लगन, प्रेम और अपनेपन से उसने हमारी माँ की सेवा की है, वह अकथनीय है। उसने जीवन के उस कठिन मोड़ पर, जब मैं नितांत अकेली रह गयी थी, माँ के हारे हुए तन और मेरे दुखी मन को सांत्वना एवं सहारे के अमृत से सींचा। दस-बीस हज़ार तो क्या, वह मेरा सर्वस्व भी ले जाती तो भी मैं आजीवन उसकी ॠणी रहती।”

सुगंधा जानती थी कि मीना का ॠण किसी भी अर्थ-शास्त्र के परे था और उसकी चोरी भले ही हर मानव निर्मित न्यायलय में दंडनीय हो, सुगंधा के ॠण-ग्रस्त हृदय में केवल आभार था, न्याय और दंड की हर दलील, हर दायरे के बाहर।

ॠण-ग्रस्त: भाग 2



अविनाश की मृत्यु के समय दोनो भाई, भाभियां, मेघा……सभी आये थे। मेघा पूरे दो महीने रही थी उसके पास। उसी दौरान उसने सुगंधा से माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में बात भी की थी – “सुगंधा, लगता है माँ कुछ ठीक नहीं हैं, कुछ भी तो खाती, पीती नहीं, दिनों दिन कमज़ोर होती जा रहीं हैं।”

“नहीं दीदी, तुम्हें वहम हो गया है। बुढ़ापा है, ऊपर से मेरा दुख क्या कम है उन्हें। बस इसीलिये कुछ खाने पीने को जी नहीं चाहता होगा” – सुगंधा ने लापरवाही से कहा था। जब तक मेघा रही थी, उसने माँ, सुगंधा और नन्ही शिखा का पूरा-पूरा ध्यान रखा था। पर उसके वापिस लौट जाने के बाद घर भर में गहन उदासी फैल गयी थी। भले ही माँ ऊपर से कितनी सहज और शांत दिखाई देती रहीं हों, किंतु अंदर ही अंदर वह घुटती रहती थीं, रोती रहती थीं। आख़िर वह एक माँ थीं और बेटी की अन्तरव्यथा को उनसे अधिक और कौन समझ सकता था। जाने कब से उनके पेट में हल्का-हल्का दर्द रहने लगा था किंतु सुगंधा की व्यस्तता और उसकी अन्य अनेक प्रकार की चिन्ताओं की बात सोच कर वह हमेशा चुप रह जातीं और अपने कष्ट की बात उससे कभी नहीं करतीं थीं। पर आखिर कब तक? अंदर ही अंदर बिमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया था। बाद में पूरा चेक-अप करवाने के बाद पता चला कि उन्हें लीवर का कैंसर हो गया था जो अपनी आख़िरी स्टेज पर था। डाक्टर ने बताया कि उनके जीवन के मात्र दो-तीन महीने ही शेष रह गये हैं।

कैसी बौराई सी देखती रह गयी थी सुगंधा माँ को। तब उसे पहली बार माँ का चेहरा बहुत कमज़ोर दिखाई देने लगा था। गाल अंदर को धँस गये थे। आँखों के नीचे काले घेरे उभर आये थे और सारा शरीर झुर्रियों से भर गया था। मेघा तो पहले ही सचेत कर गयी थी पर वह ही कहाँ ध्यान दे पायी थी माँ की ओर। सारा दोष उसका है, केवल उसका। ऐसा मान, जाने कितने दिनों तक वह अंदर ही अंदर छटपटाती रही थी, हताहत होती रही थी। फिर उसके बाद शुरु हुआ था अस्पताल, डाक्टर, दवाइयों और टेस्ट का लंबा सिलसिला।

माँ अक्सर खोई-खोई आँखों से उसकी ओर निहारा करती थीं। एक रात उसके बाल सहलाते हुए बोलीं, “मैं जानती थी कि मुझे कैंसर है पर इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है। हर किसी को कभी न कभी, किसी न किसी तरह इस संसार से विदा लेना है। समझो कि मेरा भी अंत समय अब निकट आ गया है। बस एक ही चिंता है कि मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा?” कैसी काली घटाऐं उमड़ आई थीं माँ की धुंधली हो आई पनीली आँखों में। इसके बाद उनकी हालत दिन पर दिन ख़राब होती गयी थी।

दोनों भाई, भाभियां पहुंचे थे माँ को अपने साथ लिवा ले जाने के लिये। माँ भी उनके साथ जाने को तैयार थी पर सुगंधा उन्हें कहीं भी किसी के भी पास नहीं भेजना चाहती थी। कई रातें वह अच्छी तरह सो नहीं पाई थी। रह-रह कर दोनो भाभियों का व्यक्तित्व उसके सम्मुख उजागर हो उठता था। छोटी भाभी, जो मुंबई में रहती थी, अपने दो साल के बेटे अंकुर को क्रैच में छोड़कर जाती थी। वैसे भी उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था। वह भला माँ को कैसे संभाल पायेगी। और बड़ी भाभी, उसके चार छोटे-छोटे बच्चे थे। उन्हें तैयार करना, स्कूल भेजना, उस पर घर के ढेरों काम थे करने के लिये। वैसे भी वह माँ को उतना सम्मान कभी नहीं दे पायी जितना उसे देना चाहिये था। उसके पास रह कर, बीमार और पूर्णत: उस पर आश्रित माँ के स्वाभिमान को ज़रा सी भी ठेस पहुंची तो वह और अधिक सहन नहीं कर पायेंगी। दूसरी तर्कसंगत बात यह भी उसके ध्यान में आई कि वह स्वयं डाक्टर है। इसके अतिरिक्त अस्पताल के दूसरे डाक्टर हर समय माँ की देखरेख में लगे रहते हैं। बहुत सोच विचार के बाद उसने माँ को अपने पास ही रखने का अंतिम निर्णय ले लिया और भाइयों को उससे अवगत करा दिया। इस विषय में भाइयों ने भी अधिक तर्क नहीं किया और दो-चार दिन बाद ही अपनी-अपनी नौकरियों और बच्चों के स्कूल की बात कह कर भाभियों सहित वापिस चले गये।

मेघा भी तुरंत चली आयी थी। उन दिनों माँ कुछ खाती पीती नहीं थीं। बस इंजेक्शन के सहारे ही ख़ुराक उनके अंदर पहुंचाई जाती थी। फिर भी मरीज़ के हज़ारों काम होते हैं जिन्हें बड़े धैर्य से करना पड़ता है और मेघा ने वे सब अच्छी तरह संभाल लिये थे। किंतु मेघा भी अधिक समय कहां रह पायी सुगंधा के पास। उसकी सासु-माँ बाथरूम में फिसल कर गिर पड़ीं और मेघा को बेबस हो कर लौटना पड़ा।

सुगंधा एक बार फिर ज़िम्मेदारियों और परेशानियों के साथ अकेली रह गयी थी। कभी-कभी उसका मन विद्रोही हो उठता था। वह सोचती, क्या माँ को संभालने की, सेवा करने की ज़िम्मेवारी केवल उसकी है? क्या औरों का माँ के प्रति कोई कर्तव्य नहीं? किंतु दूसरे ही पल वह स्वयं को कोसने लगती। आख़िर वह किसी दूसरे को दोष क्यों दे? उसने स्वयं ही तो माँ को संभालने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी और ऐसा कर के कोई एहसान तो नहीं किया उसने माँ या किसी और पर। यह चारपाई पर पड़ी हुई मजबूर, बीमार औरत उसकी माँ है। उसकी अपनी माँ, जिसने हर दिन, हर रात केवल उसके सुख की, उसकी हँसी-ख़ुशी की बात सोची। अपने को भूल कर केवल उसके दु:ख-सुख में खो जाने की कोशिश की थी। फिर आज उस माँ के प्रति निष्ठावान होने के स्थान पर वह हताश क्यों हो रही है।

इंसान का अपना मन ही उसका सब से बड़ा शत्रु भी है और मित्र भी। बस सोचने का ढंग सही होना चाहिये। एक बार फिर सुगंधा ने ऐसी कठिन परिस्थितियों में अपने आप को संभाल लिया था और किसी और पर आश्रित होने के स्थान पर स्वयं माँ की हर संभव सेवा का दृढ़ निर्णय ले लिया। भाग्य से उन्हीं दिनों, उसे एक पढ़ी-लिखी कुशल काम वाली मिल गयी। देखने में सौम्य और शालीन लगती थी। शीघ्र ही अपनी कार्यकुशलता से उसने सुगंधा का मन जीत लिया। तब सुगंधा ने उसे और उसके पति को घर का सर्वेंट-क्वार्टर रहने के लिये दे दिया था। उसका पति घर का सब काम करने लगा था और नौकरानी मीना ने माँ का सारा काम अपने ऊपर ले लिया था।

Sunday, September 23, 2007

ॠण-ग्रस्त: भाग 1



वह माँ ही थी जिसे सुगंधा जब जी चाहे नि:संकोच अपने पास बुला लेती थी, कभी अपने अकेलेपन के कारण तो कभी नन्हीं सी बच्ची की देखरेख के लिये। तीन वर्ष पूर्व जब पति अविनाश साल भर के लिये अमेरिका चले गये थे और सुगंधा की सासु-माँ को भी किसी कारणवश अपने मँझले बेटे के पास जाना पड़ा था, तब तत्काल सुगंधा ने माँ को बुला भेजा था। पूरे छः महीने रही थी माँ उसके पास।

कैसा स्नेहिल और दीप्तिमय व्यक्तित्व था माँ का। कुछ ही दिनों में कैसी घुल-मिल गयी थीं वह सबसे। सुगंधा डाक्टर थी। दिन भर की थकी-माँदी जब घर लौटती तो माँ को फाटक के पास ही खड़ा पाती। उसे लगता, वह उसकी माँ नहीं, एक शीतल, स्फ़ुर्तिदायक मेघखंड है जो उसके थके हुए तन और मन को अपार शांति और तृप्ति से भर देता है। नन्हीं शिखा की देखरेख, सुगंधा की घर-गृहस्थी की संभाल, सभी कुछ माँ ही करती थीं। घर का छोटा-मोटा सामान भी वह स्वयं ही पास वाली दुकानों से ख़रीद लाती थीं। छ: मास देखते ही देखते व्यतीत हो गये थे। अविनाश के अमेरिका से लौट आने के कुछ दिन बाद ही माँ वापिस दिल्ली चली गयी थीं।

ऐसा नहीं था कि उनके और कोई संतान नहीं थी। बड़ी बेटी मेघा अपने परिवार सहित बनारस में रहती थी। दोनों बेटों में से छोटा बेटा अनिल मुंबई में इंजीनियर था और बड़ा बेटा सुनील दिल्ली में वकालत करता था। माँ उसी के पास रहती थीं। पति का स्वर्गवास तो वर्षों पूर्व ही हो गया था। अब तो बस बच्चों का मुँह देख कर ही जीती थीं।

पिछले वर्ष भी तो वह सुगंधा के पास लखनऊ गई थीं। कैसे साधिकार बुला भेजा था सुगंधा ने उन्हें –
“माँ, अविनाश शायद दो सप्ताह के लिये जापान जायेंगे, शिखा और मेरा मन आपके बिना नहीं लगता, बस चिट्ठी मिलते ही चली आना”।

माँ चली आयीं थी फिर, पर कैसा आना था वह? अविनाश जापान तो नहीं जा सके, हाँ, माँ के पहुंचने के तीसरे दिन ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। हाहाकार मच गया था घर भर में। हृदय के मानों टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। बसंती रंग बिखर कर आग के अंगारे बन गये थे। सुगंधा तो मानों जड़ हो गयी थी। उसके सामने तो रेगिस्तान से तपते जीवन का नितान्त अकेला लंबा सफ़र शेष रह गया था। फिर माँ वापिस नहीं लौटी थीं। लौटतीं भी कैसे, किसके सहारे छोड़ आती सुगंधा को।

जाने वाले को क्या कभी भुलाया जा सकता है? यादें तो मन के किसी अछूते कोने में हर पल दीपशिखा सी प्रज्वलित रहती हैं। किंतु जीवन कल्पना और यादों के सहारे नहीं कटा करता। जीने के लिये यथार्थ के कटु सत्य को स्वीकरना ही पड़ता है। सुगंधा ने भी अपनी नियति से समझौता कर लिया था। भरा-पूरा ससुराल था सुगंधा का किंतु पति की मृत्यु के उपरांत प्राय: सभी ने उससे नाता तोड़ लिया था।

घर के काम तो माँ संभाल लेती थीं किंतु कुछ काम ऐसे थे जो उसे स्वयं ही करने थे। अविनाश के प्राविडेंट फ़ंड और जायदाद संबधी व्यवस्थाओं के लिये उसे अकेले ही कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते। इसी तरह के और कई कार्यों में बहुत व्यस्त हो गयी सुगंधा। न उसे घर का ध्यान रहा, न शिखा का और न माँ का।

अपने एकांतिक क्षणों में वह हर पल यह अनुभव करती कि इतने बड़े संसार में केवल माँ ही उसकी अपनी है जिसके सहारे उसे जीवन काटना है। वास्तव में यह माँ की अपार ममता ही थी जो उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाती थी, उसे संरक्षण प्रदान करती थी। सघन वट-वृक्ष की घनेरी छाया सा माँ का प्यार ही उसे टूटने से, बिखरने से बचाये हुए था।

किंतु आज वही माँ नहीं रहीं। उनका निर्जीव शरीर सफ़ेद चादर से ढका धरती पर पड़ा था। उनके दोनो निर्जीव हाथ छाती पर टिके हुए थे। वे हाथ जो अब कभी सुगंधा का सिर सहलाने को नहीं उठेंगे, वे बंद आँखें जो अब कभी उसके क्लांत तन-मन को संतोष प्रदान नहीं कर पायेंगी।

माँ चली गयी…माँ क्यों चली गयी? उन्होनें तो उसका साथ निभाने का वायदा किया था। माँ के पैरों के पास बैठी वह विचारों के तानों बानों में उलझी हुई थी। सहसा बिलख-बिलख कर रो पड़ी। तभी पास खड़े डा. गरेवाल ने उसके कंधे थपथपाते हुए कहा –

“Sugandha, you are a brave girl. You should not lose heart and face the tragedy boldly”

वह चुपचाप आँखें पोंछने लगी। तभी उसके सहकर्मी त्रिपाठी जी ने बताया कि उसने उसके सभी संबंधियों को तार डाल दिये हैं। धीरे-धीरे घर जान-पहचान वालों से भरता जा रहा था। पर सबसे बेख़बर एक बार फिर वह अपने अतीत में खो गयी।

"अहस्ताक्षरित- संधिपत्र", इतिहास शोध-संस्थान, नयी दिल्ली, 1994, प. 148-155

Friday, September 21, 2007

हम लड़कियां



"बेटी, ज़रा यह पतीला तो उठा दे नीचे से", कमर के दर्द से परेशान हो, मैने पास खड़ी धन्वी से कहा तो उसने पतीला मुझे पकड़ा दिया।

"कुछ और काम बताओ न दादी"

"लो, यह धनिया पत्ती साफ़ कर दो।"

कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से धनिया की पत्ती को डंडियों से अलग कर कटोरी में रखने लगी। इस बीच मैने दाल-सब्ज़ी बना ली, फिर उसे नहला-धुला कर तैयार कर दिया तो देखा दोपहर का एक बज चुका है।

"अब तो खाना खाने का समय हो गया न दादी?"

"हाँ बेटी, तुम जा कर अपने पापा और दादा जी को बुला लाओ"

वह दौड़ती हुई कमरे में चली गयी।

"पापा उठो, खाना खा लो, दादा जी उठो, खाना खाओ। ये कोई सोने का टाइम है?"

इतना कह वापिस आ वह एक पटड़े पर खड़ी हो गई और रोटी बेलने की ज़िद करने लगी। सहसा उसके हाथ रुक गये।

"दादी, पापा और दादा जी तो बस आराम ही करते रहते हैं। घर का सारा काम तो मुझे और आपको ही करना पड़ता है, ऐसा क्यों?" उसकी भोली आँखों में ढेरों प्रश्न थे।

"बेटी, तुम्हारे दादा जी की कमर में बहुत दर्द रहता है, तभी तो लेटे रहते हैं और……", मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह बोल पड़ी, " पर दादी, कमर में तो आपके भी बहुत दर्द रहता है, लेकिन आप……"

एकाएक वह चुप हो गयी। फिर धीरे से बोली, "हम करें भी तो क्या करें, लड़कियां जो हैं। आप भी लड़की, मैं भी लड़की। घर का काम तो हमें ही करना है।"

ऐसा कह वह फिर से टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां बेलने लगी और मैं पनियाली आँखों से उसे देखती रह गयी, जिसे केवल पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही अपने लड़की होने के अर्थ का आभास होने लगा था।

"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, प. 24

Sunday, September 16, 2007

चलो गले मिल जाओ



धर्मान्धता की कट्टर
सीमा को तोड़ दो।
कैसा यह अलगाव दिलों का
इसको छोड़ दो।।

मंदिर पर प्रहार हुआ तो,
हिंदु मन क्यों भटका?
गुरुद्वारा जलता देखा तो,
सिक्ख भाई क्यों भड़का?

नहीं खुदा मस्जिद में रहता,
न वाहिगुरू गुरूद्वारे में।
नहीं मसीहा गिरिजाघर में,
देव न देवीद्वारे में।।

जहाँ प्रेम और त्याग, अहिंसा,
सेवा का वहीं निर्झर है।
मानवता हो लक्ष्य जहाँ का,
वहीं ईश्वर का घर है॥

ज्यों प्रकाश धरा को देते,
उज्जवल चांद सितारे।
सत्य धर्म भी सदा सिखाये,
कर्म करो उजियारे॥

मानव निर्मित मंदिर मस्जिद,
फिर से बन जायेंगे।
बिछड़ गए जो भाई-भाई,
फिर कैसे मिल पायेंगे॥

अपने ही हाथों मत काटो,
अपने ही अंगों को।
हा ! विषाक्त क्यों करते जाते,
सुख स्वपनिल इन रंगों को॥

आओ भाईयो साथ चलें हम,
ऐसी विषम घड़ी में।
बिखरे मोती गुँथ जायेंगे,
फिर से एक लड़ी में॥

दुखियारी माता के आँसू,
मिल कर हम पोंछेंगे।
हर अग्नि को शांत करेंगे,
प्रगति का हम सोचेंगे॥

जात-पात के भेद मिटा दो,
सब हैं भारत वासी।
अब न अपने ही घर में हों,
राम पुन: बनवासी॥

बालक हों या युवा नागरिक,
सब को यह समझाओ।
सब अपने ही संगी साथी,
नफ़रत दूर भगाओ॥

हिंसा की चिंगारी त्यागो,
मन की शक्ति बढ़ाओ।
नहीं कोई बेगाना हम में,
चलो गले मिल जाओ॥

"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, . ४०- ४१

Monday, September 10, 2007

यूसुफ़ ख़ान का बक्सा



जब कभी यूसुफ़ ख़ान के बहु-बेटे उनसे मिलने आते, उनकी दृष्टी देर तक उस बक्से पर टिकी रहती जिसमें हमेशा ताला लगा रहता था और जिसे यूसुफ़ ख़ान कभी किसी के सामने नहीं खोलते थे। पर आज उनकी मौत के बाद यह सोच कर कि उनकी सारी जमापूँजी और वसीयतनामा इसी बक्से में होगी, उसका ताला तोड़ दिया गया। किंतु बक्से में से तीन जोड़ी कुर्ते-पायजामों तथा एक पत्र के इलावा उन्हें और कुछ न मिला। पत्र इस प्रकार था:

मैं यूसुफ़ ख़ान,

तुम तीनों बेटों का भाग्यशाली पिता। 'भाग्यशाली' इसलिये कि बुढ़ापे में जो दुर्दिन देखे, तुम लोगों का अपमानजनक व्यवहार, अवहेलना और स्वार्थपरता देखी, उसने आँखें खोल दीं और जीवन के इस कटु सत्य का आभास हुआ कि संसार में कोई अपना नहीं, यहां तक कि अपने बच्चे भी। इसी सत्य बोध से मेरा मोह भंग हो गया।

तुम लोगों की आशा के विपरीत जायदाद के नाम पर बना यह मकान धर्मार्थ दे रहा हूँ ताकि यहां स्कूल खुल सके। रही बात जमापूंजी की, तो अधिकतर पूंजी तुम तीनों की पढ़ाई, विवाह और तुम्हारी स्वर्गवासी माँ की असाध्य बिमारी पर ख़र्च हो गयी। जो थोड़ी बहुत बची है वह घर के पुराने नौकर लखन के नाम कर दी है, जिसने नि:स्वार्थ भाव से मेरी सेवा करते हुए एक सच्चे सेवक होने का धर्म निभाया। शेष बचे कपड़ों में से चाहो तो एक-एक जोड़ी ले लो। क्या पता बुढ़ापे में तन ढकने के काम आएं। बेटे तो तुम लोगों के भी बड़े हो रहे हैं न।

यूसुफ़ ख़ान

पत्र पढ़ कर सब को सांप सूंघ गया और वे फटी आंखों से बक्से में पड़े कपड़ों को देखते रह गये।

"समय का दर्पण', सुकीर्ति प्रकाशन, प. 20-21

Thursday, September 6, 2007

अपराध-बोध


Story Copyright: Sukirti Bhatnagar
Story Source: Assorted Compilation of Stories, "डूबते सूरज के साथ"
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भाग 1 भाग 2 भाग 3 भाग 4

अपराध-बोध: अंतिम भाग


एकाएक चैतन्य हो कर उन्होने पत्नी की ओर देखा जो पूर्ववत पड़ी थी। तभी अपने मन के डर को दूर करने के लिये उन्होने सत्या को ज़ोर से हिलाते हुए कहा, “उठो, थोड़ा पानी पी लो। बहुत देर से सो रही हो, गला सूख गया होगा।" सत्या के आँखें खोलते ही उन्होने चैन की साँस ली और उसे पानी पिलाने लगे। साथ ही पछतावे की भावना एक बार फिर उन पर हावी होने लगी। जैसा कि प्राय: होता आया था, उनके पास इसके अतिरिक्त कोई विकल्प न था कि वह अपने भूतकाल के दानव तथा मानसिक-शारीरिक नपुंसकता का सामना करें जिसने उनकी पत्नी के जीवन के उत्कृष्ट वर्षों को इतना असहाय, निर्बल एवं निरर्थक बना दिया था। उन्हें लगा अपराध-बोध के इस विशाल प्रवाह से बच पाना संभवत: उनके लिये बहुत कठिन था।

तभी सत्या की आवाज़ से वह पुन: सचेत हुए। उसे और पानी चाहिये था। उसकी ओर गहन दृष्टि डालते हुए उन्हें उसके चेहरे की आभा से उसके चरित्र की सबलता का आभास हुआ। साथ ही यह अनुभूति भी हुई कि उनकी कायरता एवं उदासीनता सत्या के समर्पण के गुण को नष्ट करने में सदैव ही असमर्थ रहीं, जब कि वह अपनी माँ के अनुचित व्यवहार के समक्ष झुकते ही रहे।

पर माँ तो केवल एक व्यक्ति……एक शरीर थी और शरीर नश्वर है। इस लिये माँ के निधन को अपनी और सत्या की मुक्ति समझना मात्र एक सरलमति निष्कर्ष होगा। बिहारी बाबू (और फलस्वरूप सत्या) माँ से भी अधिक अपनी भावनात्मक अचेतनता के शिकार थे। और भावनाओं का कोई जीवन-काल नहीं है। किसी भी भावना के प्रति सुषुप्तता अथवा उस से कन्नी काटने की चेष्टा ही उसे और बली बनाती है। मनुष्य केवल अपने विवेक के प्रयोग से उनके प्रती जागरूक हो सकता है और यही जागरूकता मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इस सत्य से साक्षात्कार होते ही उनके भयावह अतीत की कड़ियां एकाएक खंडित होने लगीं। उन्हें लगा कि वह जीवन-पर्यन्त जिस सत्य से दूर भागते रहे, उतना ही उनकी अक्षमताएं उनका पीछा करती रहीं। फलस्वरूप, उनकी पत्नी का जीवन दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों की एक अंतहीन श्रंखला बन कर रह गया।

अब जब वह और सत्या साथ-साथ थे, वह उन अमूल्य क्षणों की क्षतिपूर्ति करने का प्रयत्न करना चाहते थे जिन्हें उन्होने अपने अनुचित व्यवहार के कारण खो दिया था। इस क्षण उन्हे यह समझ आने लगा था कि वह सत्या की संपूर्ण देख-रेख तभी कर सकते हैं जब वह स्वयं को अपने अतीत से पूर्णत: मुक्त कर लें।

गहरे आंतरिक स्तर पर, यह बात उनके हृदय को अंदर तक बेध जाती कि उनके अथक प्रयास के बावजूद भी उनका प्रायश्चित शायद अधूरा ही रह जायेगा……शायद वह उस कारावास से कभी मुक्त नहीं हो पायेंगे, जिस में उन्होने स्वयं ही अपने आप को बंदी बना रखा था। उनका सामना इस तथ्य से भी हुआ कि असीम पछतावे की भावना ही सत्या के प्रति प्रेम एवं सेवा के प्रयत्न में विष घोल देती थी। प्रतिदिन भरसक प्रयास के बावजूद उन्हें यही लगता जैसे कहीं कुछ शेष रह गया है……जैसे सत्या इससे अधिक की अधिकारी है……जैसे नपुंसकता अभी भी किसी न किसी रूप में उन्हें सालती रहती है।

आज जब आचानक सत्या को सदा के लिये खो देने के भय से उनका सामना हुआ तो उनका अन्तर्मन परिवर्तित हो गया। जो साहस वह वर्षों तक नहीं जुटा पाये थे, अकस्मात ही उसकी कोंपलें उनके अंतस में फूटने लगीं। प्रत्यक्ष रूप से अपने अपराध-बोध का सामना करते ही उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह कृतज्ञता के निर्मल प्रवाह से पूर्णत: स्वच्छ हो गये हों और प्रथम बार जीवन के इस सत्य का बोध उन्हे हुआ कि मानसिक जागरूकता ही मुक्ति है। अपने अपराध-बोध के असली स्वरूप और उसके कारणों का ज्ञान होते ही वह उससे मुक्त हो चुके थे। उन्हे लगा जैसे अब तक वह एक दु:स्वप्न देख रहे थे और आँख खुलते ही एक नया सत्य……एक नवजीवन उन्हे इंगित कर अपनी ओर बुला रहा था……वह जीवन जो केवल सत्या और उनका था। अब सभी अवरोध समाप्त हो चुके थे तथा 75 वर्ष की वृद्धकाय अवस्था में भी वह स्वयं को युवा, सबल एवं हर्षित महसूस करने लगे थे।

किसी उचित शब्द के अभाव में यह कहा जा सकता है कि अब उनका प्रायश्चित पूरा हो सकेगा। परंतु प्रायश्चित एक नकारात्मक शब्द है और बिहारी बाबू के मन के सभी अभाव मिट चुके थे। अब वह प्रायश्चित, अपराध, पछतावे जैसी भावनाओं के परे थे और सत्या प्रथम बार पूर्णत: उनके साथ थी।

Wednesday, September 5, 2007

अपराध-बोध: उपान्त्य भाग




“अब क्या वहीं घुसे रहोगे पैसों में, या थोड़ा पानी भी पिलाओगे?”, सत्या की आवाज़ सुन जैसे सोते से जागे वह, और पैसों को डिब्बे में डाल, उसे पानी पिलाने लगे। भोजन का समय हो चला था। अक्सर सत्या को बैठने की स्थिति में कर, वह घूमने वाली छोटी मेज़ उसके पलंग से सटा कर उसे खाना परोस देते हैं। वह धीरे धीरे मूंग की धुली दाल में टुकड़े-टुकड़े की गयी रोटी गला-गला कर खाती रहती है। आज खाने की समाप्ति तक कमर के दर्द से बेहाल हो, एक ओर लुढ़क गयी वह। अब तो दो पल का बैठना भी सामर्थ्य से बाहर हो गया है। उसे पुन: बिस्तर पर लिटा बिहारी बाबू स्वयं भी पसीना-पसीना हो वहीं कुर्सी पर बैठ गये।

शरीर भले ही थक जाये किंतु मस्तिष्क तो क्रियाशील रहता है। पुरानी बातें सोचते समय बिहारी बाबू का मन फिर कड़वाहट से भर गया। जब सत्या ठीक थी तो माँ ने उसकी कीमत नहीं पहचानी और फूल सी लड़की का जीवन बर्बाद कर दिया। पर माँ से कहीं अधिक कसूरवार तो वह स्वयं हैं। पौरुषहीन तो पहले से ही थे, संस्कारविहीन और भावविहीन कैसे हो गये? भले ही माँ की मौत के बाद उसकी ओर ध्यान देना शुरू किया पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एक दिन भयानक पेट दर्द से परेशान सत्या को अस्पताल में भर्ती कराया गया तो पता चला पेट का अल्सर फट गया है। तब मरते-मरते बची थी सत्या। ओस्टोपोरोसिस की वजह से हड्डियां भी खुरने लगीं थीं। एक बार घर के कपड़े सुखाते समय तार से उलझ कर जो गिरी तो फिर नहीं उठ सकी। कमर में एसी चोट लगी कि नीचे का हिस्सा मारा गया और बिना सहारे के उठना-बैठना कठिन हो गया।

बिजली चली गयी थी। सत्या परेशान हो जायेगी, यह सोच अलमारी में से हाथ का पंखा निकाल उसे डुलाने लगे और वह चुपचाप लेटी उन्हें निहारती रही। विश्वास से परे हो गया है बिहारी बाबू का आचरण। क्या यह वही इन्सान है जिसने उसकी पूरी जवानी कोल्हू में पिसते बैल सी स्वाह होती देखी पर कभी सांत्वना के दो शब्द नहीं बोल सका, उसके रिसते घावों पर प्रेम का मल्हम न लगा सका और उसके टूटते मन को सहारे की बैसाखियां न दे सका। पर अब रात-दिन उसी की चिन्ता है उसे, उसी के नाम की पुकार है हर पल। यह अवस्था, उस पर उसके अर्थहीन जीवन का बोझ उठाना, कितना दुरूह है सब। काश! वह इस प्रकार अपंगता की स्थिति में न होती। तभी हिलता पंखा सत्या के चेहरे से टकराया। “ओफ़्फ़ो, नाक तोड़ कर रख दी मेरी। अब जा कर लेट जाओ। बहुत हो गया पंखा डुलाना।” सचेत हो बिहारी बाबू उठ खड़े हुए। तभी बिजली आ गयी। दोपहर के तीन बज रहे थे। बाहर की चौंध आँखों में चुभने लगी तो पर्दे खींच, अंधेरा कर, कूलर चला कर लेट गये वह।

यह नींद भी कैसी अदभुत होती है। पूरी नींद ले लेने पर तन-मन दोनों ही फूल से हल्के हो जाते हैं और हर प्रकार की दुविधा, चिंता से कुछ देर को मुक्ति मिल जाती है। अभी कुछ ही देर आँख लगी थी कि सत्या की आवाज़ से हड़बड़ा कर उठ बैठे। वह बैठना चाहती थी। आधी नींद में बिहारी बाबू एकाएक झल्ला उठे।

“कुछ देर मुझे भी चैन से बैठने दोगी या सारा दिन यूँ ही कांय-कांय करती रहोगी। मैं भी इन्सान हूँ। मुझे भी आराम चाहिये।”

“अरे तो फिर नींद की गोलियां दे कर सुला क्यों नहीं देते इस धरती के बोझ को हमेशा के लिये।”

“अब चुप भी करो, बेकार की बातों से दिमाग मत चाटा करो”, कहते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ गये बिहारी बाबू। माया कब से दरवाज़ा खटखटा रही थी। अंदर आते ही वह समझ गयी कि माहौल गर्म है। बोली, “लाइये बाबू जी, मैं देखती हूँ इन्हे।" बिहारी बाबू की सहायता से उसे बिस्तर पर बिठा वह चाय बनाने चली गयी। जब तक उन दोनो का चाय-नाश्ता समाप्त हुआ, माया काम निपटा कर लौट गयी। सत्या को एक बार फिर लिटा बिहारी बाबू दरवाज़े के सामने कुर्सी खींच कर बैठ गये।

मन बोझिल हो रहा था और नसें टस-टस कर रहीं थीं। आज क्या हो गया था उन्हें जो बेबस पत्नी पर बरस पड़े। आखिर दोष ही क्या था उसका? दोष तो उनका अपना है जो घोड़े बेच कर सोते रहे। दोष तो हमेशा ही उनका ही रहा है।

शाम गहराने लगी थी। धीरे-धीरे दूर-पास की बत्तियां जलने लगीं तो सत्या का ध्यान आया। उठ कर बिजली जलाई तो देखा वह गहरी नींद में थी। जाने क्यों उसे इस प्रकार निश्चल पड़ा देख सिहर उठे वह। सत्या…उसके सिवा उनका है ही कौन इस संसार में। उसकी मौजूदगी का एहसास हर पल घर को क्रियाशील रखता है और एक गति से चलायमान रहते हैं सुबह-शाम, रात-दिन्। सत्या का सान्निध्य ही तो सार्थक करता है घर की परिभाषा को। अन्यथा आस-पास का नि:शब्द ठहराव तो उनके जीवन को घोर एकाकीपन से भर पूर्णत: समाप्त कर देगा और जीते जी मर जायेंगे वह सत्या के बिना।


क्रमश:………

Tuesday, September 4, 2007

अपराध-बोध: भाग 2


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छोटी सी ही थी जब माँ चल बसी। तब शराबी पिता और तीन भाइयों का सारा काम उसके नन्हे कंधों पर आ पड़ा। भाई तो समय के साथ-साथ एक-एक कर के दूर-पार बस गये और नशेड़ी पिता ने उसकी उम्र से दस साल बड़े साधारण कद-काठी वाले बिहारी बाबू से उसका गठजोड़ कर सर का बोझ हल्का कर लिया। पर कब उठा पाई वह वैवाहिक जीवन का सुख्। भले ही घर के हालातों को देखते हुए वह सखियों संग सावन के झूले न झूल सकी पर अपनी कुंवारी आँखों में सपने तो उसने भी सजाये थे। किंतु उसके भाग्य में तो अंश-अंश बिखरना लिखा था। भूखी-प्यासी सारी-सारी रात बिना बिस्तर के कड़कती ठंड में ठिठुरती वह सोचा करती, ‘क्या एसा ही होता है विवाह?’ काश उसने विवाह न किया होता। पर वह सदैव मौन धारण किये रही। मुँह खोलती भी तो किसके सामने। भाइयों ने तो कभी उसकी सुधि ली ही नहीं और पिता नशे की हालत में एक ट्रक के नीचे आ स्वर्गवासी हो चुका था। रही बात बिहारी बाबू की, तो वह सब कुछ देखते हुए भी कुछ नहीं देखते थे। एसी ही भयंकर स्थितियों को झेलते हुए समय निकलता रहा और एक दिन उसकी हिटलर सास का देहांत हो गया। अब उसका एक-छत्र राज्य था घर में किंतु उत्साहीनता और असमर्थता आड़े आने लगी क्यों कि अब तक उसका शरीर विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो चला था।

तभी बाहर का दरवाज़ा खटका। “अजी सुनते हो, माया आई है”, अपने अतीत से बाहर आ उसने ज़ोर से पति को पुकारा तो वह चौंक कर उठ बैठे और दरवाज़ा खोल दिया। “अब तुम भी हाथ-मुँह धो लो, वह चाय बना रही है", तौलिये से हाथ पोंछते हुए बिहारी बाबू बोले तो नन्हें बच्चे सम मुँह बिसूरते हुए सत्या ने कहा, “हर समय बस यही काम…उठो-बैठो। मुझे नहीं उठना अब।” तब गीले तौलिये से ही उसका मुँह साफ़ कर वह चाय में डुबो-डुबो कर उसे बिस्कुट खिलाने लगे। बाद में स्वयं का नाश्ता कर बरसों पुराना ट्रांज़िस्टर आन कर दिया और कान से लगा समाचार सुनने लगे। एक ज़माना था जब बहुत कुछ पढ़ा-लिखा करते थे पर अब तो सब छूट गया है, बस एक ट्रांज़िस्टर के सहारे ही बाहर की दुनिया को जी लेते हैं।

“बाबू जी, आज तो बीबी को नहलाना होगा। दो दिन हो गये नहाए”, पास खड़ी माया ने पूछा तो उसकी 15-16 साल की बेटी को बरामदे से व्हील-चेयर लाते देख उठ खड़े हुए और अलमारी में से सत्या के धुले कपड़े और तौलिया निकाल लाए। अब तक माया बेटी की सहायता से सत्या को व्हील-चेयर पर बिठा कर नहलाने के लिये बाथरूम में ले गयी थी। फिर देर तक उन्हें नहलाने-धुलाने, कपड़े बदलने और बाल संवारने का क्रम चलता रहा। इसी बीच माया बिस्तर की मैली चादर और तकिये का गिलाफ़ बदल गयी। जब तक सत्या को पुन: बिस्तर पर लिटाया गया, वह थक टूट कर बेहाल हो गयी थी।

घर का सारा काम समाप्त कर, दोपहर का खाना बिहारी बाबू के पास ही टेबल पर रख जब माँ-बेटी चलीं गयीं तो उन्होने उठ कर दरवाज़ा बंद कर लिया। अब माया शाम को आयेगी, धुले कपड़े समेटने, दोपहर के दो-चार बर्तन मांजने और बुज़ुर्गों को चाय-नाश्ता देने।

तभी बिहारी बाबू को सब्ज़ी वाले का ध्यान हो आया और वह धीरे-धीरे चलते दरवाज़े पर जा खड़े हुए। बाहर की दुनिया का रंग ही कुछ और है। खुला-धुला आसमान, चहचहातीं चिड़ियां, दूर-दूर तक फैले पेड़ों पर फुदकती गिलहरियां, फूल-पत्ते और आते-जाते लोगों का भला लगता शाब्दिक सम्मेलन। पहले तो नियम से दूर तक सैर कर आया करते थे। गोल चक्कर के पास यार-दोस्तों से मिलना भी हो जाता था। अब तो धुंधली हो आयी आँखों के कारण बाहर नहीं निकलते। कहीं उल्टे सीधे पैर रपट गया तो और मुसीबत हो जायेगी। फिर सत्या के कारण तो कमरे से हिलना ही नहीं चाहते थे।

तभी मंदिर से आते पड़ोसी मंगत राम ने पूछा, “किसी का इंतज़ार है क्या बिहारी बाबू, जो दरवाज़े पर खड़े हो।” “इंतज़ार किस का भाई साहब, न बाल न बच्चे, न नाती-पोते। बस सब्ज़ी वाले की बाट जोह रहा था”, दीर्घ निश्वास लेते हुए उन्होंने कहा और दूर से सब्ज़ी वाले को आता देख घर से बाहर आ गये। ढेरों हरी, ताज़ी सब्ज़ियाँ ठेले पर हैं। आधा किलो घिया, आध पाव टमाटर, एक पपीता और चार केले तुलवा लिये उन्होने। अधिक का करना भी क्या है। सत्या तो नाम मात्र का ही खाती है। जब तक वह ठीक थी, क्या बढ़िया खाना बनाती थी। अरबी, कटहल, भरवां भिंडी, करेला…उंगलियां चाटते रह जाते थे सब, पर वह स्वयं कहां खा पाती थी कुछ।

“बाबू जी, पैसे”, फेरी वाले की आवाज़ सुन उनकी तंद्रा भंग हुई तो हाथ में पकड़े दस-दस के नोट उसे थमा दिये, फिर अंदर आ सब्ज़ी-फल रसोईघर में रख, हाथों में चुभते छुट्टे पैसे गिनने लगे। कभी ठीक, तो कभी कम पैसे लौटा जाता है सब्ज़ी वाला। माया का भी यही काम है। दांव लगते ही पैसे हड़प लेती है। अब जब घर का राशन-पानी और अन्य सामान लायेगी तो पैसों की थोड़ी बहुत हेरा-फेरी तो करेगी ही। कर भी क्या सकते हैं वह। उनकी अपनी मजबूरी है। आँखों के कारण पैसों का भुगतान करने तक में कठिनाई होने लगी है। फिर भी कोटि-कोटि धन्यवाद है ईश्वर का जो उनकी गृहस्थी की घिसटती गाड़ी चला रहा है।


क्रमश:………






Sunday, September 2, 2007

अपराध-बोध: भाग 1


रात का एक बज चुका है, पर हर रात की तरह बिहारी बाबू की आँखों में लेशमात्र भी नींद का नाम नहीं। रात भर चालीस वाट के जलते रहने वाले बल्ब की रौशनी में भी उन्होंने टटोलते हुए बिस्कुटों वाला डिब्बा उठाया, फिर गहन सन्नाटे में उनका स्वर गूँजा, “बिस्कुट खाओगी सत्या?” पर साथ वाले पलंग पर लेटी पत्नी नि:शब्द पड़ी रही। केवल उसके हिलते दाहिने हाथ ने जागते रहने का संकेत दिया। “पानी पिओगी?”, पुरुष स्वर फिर उभरा। इसके साथ ही धीरे-धीरे खिसकते हुए वह पलंग से उतर गये और अपनी चप्पल ढूंढने लगे जो शायद पलंग के नीचे चली गयी है।

‘यह माया भी कोई काम ढंग से नहीं करती। हज़ार बार कहा है, झाड़ू पोंछा लगाते समय जूते-चप्पल सामने दिवार से लगा दिया कर, पर माने तब न’, मन ही मन खीजते वह नंगे पैर ही पत्नी के सामने जा खड़े हुए। उसका पीला, मुर्झाया मुख और ढांचा रह गये शरीर को देख आँखें भर आईं उनकी। माथे पर भंवर बनाते उसके सफ़ेद बालों को हथेली से पीछे करते थोड़ा झुक कर उन्होंने पुन: पूछा, “थोड़ा पानी पिलाऊँ क्या?” उन्हें एकटक निहारती पत्नी की आँखों ने पल भर में बहुत कुछ कह दिया परंतु प्रत्यक्ष में वह केवल इतना ही बोली, “अब उठे ही हो तो पिला दो।” तब गिलास में से चम्मच-चम्मच भर पानी उसके मुँह में डाल वह अपने बिस्तर पर लेट गये।

अभी पंद्रह-बीस मिनट ही हुए थे लेटे कि पत्नी ने कहा, “छाती बहुत जल रही है, कुछ करो।” तब घुटने मोड़ वहीं पलंग पर बैठे-बैठे ही बिस्तर के साथ लगे रैक पर रखी शीशी में से एक गोली निकाल कर उन्होंने पत्नी के मुँह में डाल दी। “क्या बजा है?”, उसने पूछा। “ढाई”, सामने दिवार-घड़ी के नज़दीक जा कर, उस पर दृष्टी जमाये ही उन्होंने कहा और साथ लगे बाथरूम की ओर मुड़ गये। बाथरूम से बाहर आते ही साथ वाला पलंग फिर चरमराया, “जी मिचला रहा है, बिठा तो दो थोड़ी देर के लिये।”

पहले तो वह डबल-बेड पर उनके साथ ही सोती थी पर पिछले एक साल से स्प्रिंग वाले पलंग पर सोती है जिस पर बिछे गद्दे में सुराख़ हैं, जिन से हवा छनती रहती है। फलस्वरूप, उसकी पीठ पर घाव नहीं होते। पलंग का हैंडल घुमा उसे बैठने लायक बना दिया उन्होंने, पर वह बहुत नीचे खिसक आयी थी, इसलिये दोनों कंधों के बीच हाथ डाल कर खींचते हुए उसे बिठाना पड़ा। इतने में ही बुरी तरह हाँफ़ गये वह और कुर्सी खींच कर वहीं सत्या के पास बैठ गये। अब इस 75 वर्ष की उम्र में क्या आसान है यह सब करना। घुटनों का दर्द जी का जंजाल बना है और आँख कान भी जवाब दे रहे हैं। संभवत: इसी कारण चेतना अधिक जागरूक हो गयी है। तभी तो ध्यान हर पल सत्या की ओर ही लगा रहता है ताकि कोई अनसुनी घड़ी उन्हें पछतावे से न भर दे। पर पछ्तावे का दंश तो उन्हें पिछले कयी वर्षों से साल ही रहा है।

जब समय था तब तो ध्यान नहीं दे पाये सत्या की ओर, और अब जब अपने दायित्वों का भान हुआ तो बंद मुट्ठी से रेत की तरह समय हाथ से निकल चुका था। सही उम्र में विवाह हो गया था बिहारी बाबू का। सुंदर, सुशील दुल्हन तितली सी उड़ती फिरती थी घर भर में। किंतु तीन वर्ष बीतने पर भी जब वह माँ नहीं बनी तो सास उसे साथ ले साधु, महात्माओं के चक्कर काटने लगी। टोनों टोटकों और झाड़-फूंक का सहारा भी लिया किंतु सब विफ़ल रहा। फिर दौर चला सत्यवती के प्रति सास की प्रताड़नाओं का। भरी सर्दी में भी वह छत पर बिना बिस्तर के सुलाई जाती और खाने-पीने से भी वंचित रखा जाता उसे। घर में बंधे जानवर से भी अपनापन हो जाता है पर उसके लिये किसी के मन में रत्ती भर सहानुभूति नहीं थी। धीरे-धीरे उसकी कुंदन सी देह मिट्टी होने लगी। बांझ बहू किस काम की, इसलिये एक दिन सास ने बिहारी बाबू से दूसरा विवाह कर लेने की बात कही। हालांकि वह माँ के आज्ञाकारी पुत्र थे और उनकी कही हर बात उनके लिये पत्थर की लकीर थी किंतु दूसरे विवाह की बात पर उन्होंने चुप्पी साध ली क्यों कि वह जानते थे कि उन में ही पिता बन पाने की क्षमता नहीं। किंतु अपनी इस कमी को वह कभी किसी के सामने प्रकट नहीं कर पाये, और न ही दूसरे विवाह की हामी भरी। फलस्वरूप, माँ का दुर्व्यवहार पत्नी के प्रति दिनों दिन बढ़ता ही गया। इस पुरुष-प्रधान समाज में पिसती तो हमेशा नारी ही है। यही सत्या के साथ भी हुआ। सम्पूर्ण होते हुए भी बांझ समझी जाने के कारण हर पल दुत्कारी गयी और सामाजिक परिवेश में अपना सम्मान खो बैठी।

तभी दरवाज़े के सामने से गुज़रते चौकीदार की आवाज़ से उनकी तंद्रा भंग हुई तो पत्नी की ओर देखा जो बैठे-बैठे ही ऊंघ रही थी। “सत्या, अब लेट जाओ, बहुत देर से बैठी हो।”, एक ओर को लुढ़के उसके सर को सीधा कर, पीठ पीछे लगे दोनों तकिये निकालते हुए उन्होंने कहा। “अब तुम भी जा कर लेट जाओ, सारी रात क्या यूँ ही मेरे सरहाने बैठे रहोगे?”

तब बिस्तर पर लेटते ही थकावट के कारण उनको नींद आ गयी। पर सत्या दुबारा नहीं सो सकी और समय चक्र से घूमते पंखे पर दृष्टी गड़ाये अपने अतीत में खो गयी।


क्रमश:……


नवीनतम कथा संग्रह "डूबते सूरज के साथ" में से…


Wednesday, August 29, 2007

प्राचीन



चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

प्राचीन संग्रहालय में घूमते समय नन्हें बेटे ने अपनी माँ से पूछा, "माँ, 'प्राचीन' का क्या अर्थ होता है?"
"बेटा, प्राचीन का अर्थ है पुराना…यानि पुराने समय का। यहाँ जो भी चीज़ें तुम देख रहे हो न, वे सभी सदियों पुरानी हैं, जिन्हें संभाल कर रखा गया है।"
"और पुराने लोग माँ? जैसे हमारे दादा-दादी, जिन्हें बेकार समझ घर से बेघर करने की बात की जाती है…क्या उनकी संभाल नहीं होनी चाहिये?"

साथ खड़े अपने बेटे साहिल की बात सुन सिहर उठी इला और प्रथम बार प्राचीन की महत्ता का बोध हुआ उसे।

"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, प. 14

Saturday, August 25, 2007

मैं और मेरा प्रियतम


दूर कहीं, अम्बर के नीचे,
गहरा बिखरा झुटपुट हो।
वही सलोनी नदिया-झरना,
झिलमिल जल का सम्पुट हो।

नीरव का स्पन्दन हो केवल,
छितराता सा बादल हो।
तरूवर की छाया सा फैला,
सहज निशा का काजल हो।

दूर दिशा से कर्ण उतरती,
बंसी की मीठी धुन हो।
प्राणों में अविरल अनुनादित,
प्रीत भरा मधु गुंजन हो।

उसी अलौकिक निर्जन स्थल पर,
इठलाता सा यह मन हो।
दूर जगत की दुविधा से,
मैं और मेरा प्रियतम हो।


"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, प. 12

Sunday, August 12, 2007

जीवन और कहानी



माँ अपनी डेढ़ वर्ष की बच्ची को 'प्यासे कौए' की कहानी सुना रही थी जो अपने सिर को पीछे की ओर झुकाये एकटक माँ को निहारती पैर फैलाए सामने बैठी थी और माँ द्वारा बार बार सुनाई जाने वाली कहानी के आगे के अंश अपनी तुतली भाषा में बोल रही थी।

'एक कौआ', माँ ने कहा।

'पासा', (प्यासा) बच्ची।

'घड़े में पानी', माँ।

'तोड़ा', (थोड़ा) बच्ची।

'कौए ने डाले', माँ।

'पतल', (पत्थर), बच्ची।

'पानी आया', माँ।

'ऊपल', (ऊपर) बच्ची।

'कौए ने पिया', माँ।

'पानी', बच्ची।

'कहानी हो गयी खत्म', माँ

इस बार माँ की हथेलियाँ कहानी की समाप्ति की बात करते हुए ऊपर की ओर खुल गयीं थीं, पर बच्ची एकाएक रोने लगी।

'नो, नो कानी नो कतम, कानी ओल, नो कतम'
(नहीं, नहीं कहानी खत्म नहीं, कहानी और)

माँ फिर से कहानी सुनाने लगी।

'एक कौआ'

'पासा', बच्ची ने कहा और एक बार फिर कहानी के अंश दोहराते थक कर सो गयी। उसे सोया देख माँ सोचने लगी कि जीवन और कहानी का तो चोली-दामन का साथ है; जब तक जीवन है, तब तक कहानी है।


"समय का दर्पण', सुकीर्ति प्रकाशन, प. 29-30

Saturday, August 4, 2007

त्रासदी


एसा हादसा -
पहली बार तो नहीं हुआ,
कि जब
पटड़ियों पर दूर-दूर तक फैले
क्षत-विक्षत रक्तरंजित शवों के
आभास मात्र से ही
आँखें नम हुई हों।

लेकिन
हमेशा की तरह
हम
कुछ नहीं कर सके,
केवल
सोचने, घबराने और प्रशासन के प्रति
रोष प्रकट करने के।

चरमराई व्यवस्था का क्या,
राजनितिज्ञों की कुर्सियां सलामत रहें।
हादसों से भरपूर
अख़बारी सुर्खियों का क्या,
यह तो आम बात है उनके लिये।

प्रजातंत्र के नाम पर
जनमानस की छाती पर मूँग दलती
इस स्वार्थपरता का अंत कहां है?
मीलों की दूरी नापता
गहन सन्नाटे को चीरता चीत्कार;
कहां है इस करूण क्रंदन का अंत -
जिसे -
दु:स्वप्न मान भुलाया जा सके?

मरघट बनी
इस व्यवस्था में
कोई गिनती नहीं मरने वालों की,
गिनती है तो मात्र उन पलों की
जो वे जिये,
गिनती है तो सुगंध बिखेरते उन स्पर्शों की
जो घर-परिवारों में रचे बसे हैं,
गिनती है तो उन यादों की
जो टूटे दिलों की कगार पर
चाँद सी टँगी हैं
और
बेकल, बेबस, बरसती उदास आँखें
चकोर हो गयी हैं।

"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, प. 10-11

Wednesday, August 1, 2007

प्रदूषण


वह तेज़ी से अपने गंतव्य की ओर बढ़ा चला जा रहा था कि पुल पार करते समय उसकी नज़र पटरियों के बीच रखे प्लासटिक-नुमा डिब्बे पर पड़ी। कहीं इसमें बम तो नहीं, आतंक-वादियों की सक्रिय होती गतिविधियों पर ध्यान जाते ही उसने सोचा और पलक झपकते ही डिब्बे को नदी में फेंक दिया। इसी बीच धड़धड़ाती हुई गाड़ी उसके निकट आ गयी। तब अपने बचाव का कोई दूसरा रास्ता न देख कर वह रेल की पटरी पकड़ नीचे लटक गया। गाड़ी के निकल जाने के बाद उसने ऊपर उठने की भरसक चेष्टा की किंतु असफ़ल रहा।

अब तक कुछ लोग पुल पर आ गये थे। वह मदद के लिये चिल्लाया किंतु उसकी मदद करने की अपेक्षा उन लोगों ने उसे ही आतंकवादी मान कर नदी में गिरा दिया। तैरना न आने के कारण कुछ देर तो वह पानी में गोते खाता रहा, फिर डूब कर मर गया और मैं समाज के इस दूषित परिवेश के विषय में सोच उद्विग्न हो उठी जहां भय और अविश्वास के वशीभूत हो हम रक्षक को भक्षक मान बैठते हैं।

"दैनिक ट्रिब्यून" में प्रकाशित

Wednesday, July 25, 2007

दोषी कौन



“बीबी जी, गयी रात राघवन ने अपने पड़ोस की ही नाबालिग लड़की से मुँह काला कर लिया। हर ओर उसकी थू-थू हो रही है।” रंगा ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा तो अकस्मात मुझे वह दिन याद आ गया जब समाज की दूषित परम्पराओं के वशीभूत हो चादर डालने की प्रथा के अनुसार पिछले साल ही हमारे माली के बीस वर्षीय बेटे राघवन का विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध उससे पंद्रह वर्ष बड़ी विधवा भाभी से कर दिया गया जिसे वह अब तक माँ समान मानता आया था। फलस्वरूप, जो संबंध पति-पत्नी का होता है वह उनके बीच कभी स्थापित ही नहीं हो पाया। अन्तत: गयी रात अपने किन्हीं दुर्बल क्षणों में अत्रिप्त कामनाओं के वशीभूत हो वह अपनी मर्यादा भूल बैठा। राघवन की मन:स्थिति से भलीभान्ति परिचित होते हुए भी आज उसी के सगे-संबंधी और गली-मुहल्ले के लोग उसे कड़ी सज़ा देने के लिये हर ओर मधुमक्खियों की तरह बिखर गये हैं। किंतु दोष क्या केवल राघवन का है?

"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल, प. 56

Wednesday, July 18, 2007

धरातल


शताब्दियाँ बदलीं
किंतु नारी
आज भी, रेत के घरौन्दे सी
हर पल टूटती बिखरती
किसी ठोस धरातल के लिये भटक रही है।

उसका करूण क्रन्दन
वर्षों वर्षों तक
द्रवित करता रहा है
धरती और आकश के अंतस को।
घर के एक कोने से दूसरे कोने तक
छाया सी मंडराती वह
केवल अलग-अलग सम्बोधनों से पहचानी जाती है,
उसकी स्वयं की
कोई पहचान नहीं है शेष।

आधुनिकता का जामा पहन,
भले ही
पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर
चलना सीख गयी हो,
पर नारी की छाप तो अमिट है।
तभी तो
असुरक्षा का साया, यौन शोषण का भय,
घर-बाहर
सब कहीं
उसे आतंकित किये रहते हैं।

दिवार पर लटके कैलेण्डर सी
बदल दिये जाने के डर से
सहमी रहती है वह्।

क्या यही है उसकी नियति
या
वह स्वयं उत्तरदायी है
अपनी ऐसी स्थिति के लिये?
सामाजिक विसंगतियों को भी नकारा नहीं जा सकता,
तथापि
सच तो यह है
कि अधिकतर नारी ही
नारी का शोषण करती आयी है,
कभी
नाच और संगीत की आड़ में
कोठों को सदा बहार बनाये रखने के लिये
तो कभी
दहेज अथवा बहू के बांझ होने के नाम पर
वह चुपके-चुपके
अमानवीय क्र्त्यों के चक्रव्यूह रचती है।

इतना ही नहीं,
नारी मन के रहते
अपनी कोख की अजन्मी कन्या की
हत्या करने से भी वह चूकती नहीं;
छि:
ऐसा घोर निरादर
‘माँ’ और ‘ममता’ जैसे पावन शब्दों का।

जब नारी ही नारी की शत्रु है
तो फिर
दूसरे क्यों कर उसे सम्मान दे पायेंगे।
ऐसे में
शोषित, तिरस्क्रत और कलंकित
वह
यूँ ही
भटकती रहेगी
किसी ठोस धरातल की खोज में।
"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, प. 69-71

Saturday, July 14, 2007

संस्कार



“यह क्या माँ, आज फिर अंगूठे पर पट्टी?” – नाश्ता करने के लिये कुर्सी पर बैठते हुए गौरव बोला।

“यह तो तुम्हारे बाबू जी की पुरानी आदत है न…तिल का पहाड़ बनाने की। ज़रा सा चाकू क्या लग गया, लगे डिटौल और पट्टी ढूँढने। और कुछ नहीं।“

“कुछ कैसे नहीं? हज़ार बार कहा है सब्ज़ी काटते समय अंगूठे पर कपड़ा लपेट लिया करो, पर मानो तब न। बरसात का मौसम है, घाव पक गया तो मुसीबत हो जायेगी।“ – पिता ने शिकायती स्वर में कहा तो गौरव ने एक गहरी नज़र माँ पर डाली और जल्दी ही नाश्ता समाप्त कर उठ खड़ा हुआ।

“अच्छा माँ, बाबू जी, अब चलता हूँ। पर आप दोनों को याद है न कि आज मुझे पी.ऐच.डी. की डिग्री मिलने वाली है? इस लिये घर लौटने में थोड़ी देरी हो जायेगी।”

“सुनिये जी, इतनी बड़ी डिग्री मिलने वाली है हमारे बेटे को। इस ख़ुशी के अवसर पर हमें भी तो चाहिये कि उसे कुछ दें। पर दें क्या?”

“इस में सोचना क्या? मेरे विचार से तो उसे गर्म सूट का कपड़ा ले देना चाहिये। अब पढ़ाई पूरी कर चुका है, कल को नौकरी ढूंढेगा, जगह-जगह इंटरव्यू देने जायेगा। कम से कम एक तो ढंग का सूट होना चाहिये उसके पास।”

“बात तो ठीक है आपकी, पर अच्छा कपड़ा तो चार-पाँच हज़ार के करीब आयेगा और इतने पैसे…?”

“कोई बात नहीं, मैं प्रबंध कर लूँगा।”

शाम को चाय पार्टी की समाप्ति के बाद गौरव जब घर लौटा तो उसके बाबू जी ने उसे गले से लगाते हुए कहा, “डिग्री मिलने की बहुत-बहुत बधाई हो बेटा। ये लो पाँच हज़ार रुपये और हमारी ओर से उपहार स्वरूप अपनी पसंद का गर्म सूट का कपड़ा खरीद लो।”

“धन्यवाद बाबू जी” – कह कर गौरव ने पिता के पैर छू लिए। अगले दिन बाज़ार से लौटते ही गौरव ने एक बड़ा सा डिब्बा माँ के सामने रख दिया। “माँ, यह मैं तुम्हारे लिये लाया हूँ। यह फ़ूड-प्रोसेसर है जो बहुत काम की चीज़ है। इस में सब सब्ज़ियाँ कट जाती हैं…मसाला पिस जाता है…यहां तक कि आटा भी गुँध जाता है। इसके आने से आप को तो आराम हो ही जायेगा, साथ ही बाबू जी को भी, क्यों कि अब उन्हें डिटौल और पट्टी ढूंढने के लिये इधर उधर भागना नहीं पड़ेगा।” इतना कह गौरव हँस पड़ा।

“यह तूने क्या किया बेटा?” माँ की आँखें भर आईं – “अपने सूट के बदले यह फ़ूड प्रोसेसर खरीद लाया। पर क्यों?”

क्यों कि माँ मुझे आपके और बाबू जी के असीम प्यार और आशीर्वाद के अतिरिक्त अन्य किसी उपहार की आवश्यकता ही नहीं है” – गौरव नें माँ के ख़ुरदरे, जगह-जगह से कटे-फटे हाथों को प्यार से सहलाते हुए कहा तो माँ यह सोच कर गदगद हो उठी कि उसके पुत्र ने केवल औपचारिक उच्च शिक्षा ही प्राप्त नहीं की, अपितु त्याग एवं नि:स्वार्थ भाव जैसे उन शुभ संस्कारों की गरिमा को भी बनाये रखा है जो वह उसे बचपन से देती आ रही थी।


"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, कैथल, प. 45-46

Thursday, July 12, 2007

विष-अम्रित



"ये क्या सड़े-गले आम डाल दिये हैं लिफ़ाफ़े में, ऐसे फल खिला कर मारना है क्या हमें? सच हेरा-फेरी में तुम लोगों का जवाब नहीं", भुनभुनाते हुए वह आधुनिक महिला दाग़ लगे आमों को लिफ़ाफ़े से निकाल-निकाल कर कूड़े के ढेर की ओर उछाल रही थी, जिन्हें छमिया की गिद्ध द्रिष्टी ने दूर से ही देख लिया। वह दौड़ती हुई उस ओर लपकी और पल भर में ही सात-आठ बदरंग आम अपनी फटी झोली में समेट लिये।

"अरे ओ मंगू, कालू, भौंरी, देखो तो तुम्हारे लिये क्या लाई हूँ", सड़क पार पहुंच कर उसने बच्चों से कहा और थोड़ी ही देर में उसके वे छोटे-छोटे बच्चे नंगे पैर, नंगे शरीर, म ई मास की तपती सड़क पर मस्ती से आम खाते दिखाई दिये। "कितने मीठे और स्वाद हैं न ये आम", होंठों पर जीभ फिराते, प्रसन्नचित्त एक-दूसरे को निहारते वे कह रहे थे।

कैसी विडम्बना है यह, एक ही वस्तु किसी एक के लिये विष तो दूसरे के लिये अम्रित कैसे हो जाती है?



"समय का दर्पण", सुकीर्ती प्रकाशन, कैथल, प. 12

Wednesday, June 6, 2007

पुरस्कार




दिसंबर का सर्द अलसाया मौसम। ऐसे में बिस्तर से उठने की कौन सोचता है, और फिर अभी पूरी तरह सुबह भी कहाँ हुई थी। कम से कम दो घंटे तो और आराम से सोया जा सकता है – ऐसा सोच मैने रजाई मुँह तक खींच ली। तभी धीरे से रजाई हटा सुधांशु ने एक कोमल सा स्नेह चिन्ह मेरे माथे पर अंकित कर दिया, “सालगिरह मुबारक हो चारु।”

“सालगिरह! ओह, मैं कैसे भूल आज का यह शुभ दिन।” आज हमारे सुखद वैवाहिक जीवन को पूरे पाँच वर्ष हो जायेंगे।

“तुम्हें भी मेरे प्यारे सुधांशु, तुम्हें भी बहुत बहुत मुबारक हो आज का यह शुभ दिन।” इतना कह मैं बहुत ही सहज भाव से पति के अंक में सिमट गयी। कैसा अनोखा संरक्षण और निश्छल प्रेम, कैसा देवतुल्य व्यक्तित्व, धन्य हो गयी मैं तो। सुधांशु जैसा पति हर किसी को थोड़े ही मिल पाता है। कितना चाहते हैं वह मुझे, कितना मान करते हैं वह मेरा और मेरी भावनाओं का। नन्ही पूजा के आ जाने से तो जैसे जीवन की हर साध पूरी हो गयी। सोचते-सोचते अपने अतीत में खो गयी थी मैं।

“सो गयीं क्या?”

सुधांशु की आवाज़ सुन पुन: चैतन्य हुई। सुबह के सात बज गये थे। “ओह! इतनी देर हो गयी, पूजा को स्कूल भी भेजना है।” पूजा को भेजने के कुछ देर बाद मैं पुन: इनके पास लौट आयी। ये बाहर बरामदे की मीठी-मीठी, खनकती धूप में बैठे अखबार देख रहे थे। बड़ी-बड़ी पनीली स्वप्निल आँखें, गेंहुआ रंग और काले, सघन, सुंदर केश, सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने, कंधे पर शाल डाले, ये बड़े ही तन्मय भाव से बैठे थे। मेरे लौट आने का बोध शायद इन्हें नहीं था। मैं कयी क्षण मंत्र-मुग्ध सी इन्हें निहारती रही। कैसा आत्मविश्वास और गरिमा झलकी है इनके चेहरे से। घर का शांत सरल वातावरण, सर्दियों की उजली धूप का मीठा-मीठा आभास और हर ओर रंग-बिरंगे फूलों की भीनी-भीनी महक्…मैं विभोर हो उठी। हल्के-हल्के पग रखती इनके पीछे जा खड़ी हुई और बड़े ही स्नेह से बाँहें इनके गले में डाल, अपना एक गाल इनके सिर पर टिका दिया।

“सुनो, आज कहीं घूमने चलते हैं।”
“बिल्कुल चलेंगे।”, मुस्कुरा कर उन्होंने कहा।

मुस्कुराते हुए वह कितने अच्छे लगते हैं। दाँयें गाल पर एक गड्ढा सा उभर आता है और नन्हें-नन्हें दाँत बच्चों जैसी आभा उत्पन्न करते हैं

अपूर्व आह्लाद से वशीभूत हो मैं घर के कार्यों में व्यस्त हो गयी। गुलाब के फूल इन्हें बहुत पसंद हैं। पीला, सफ़ेद और लाल गुलाबों का एक गुलदस्ता बना कर ड्राइंगरूम की खिड़की के नीचे रख दिया। अगरबत्तियों की भीनी महक से सारा घर महक उठा। इनका मनपसंद भोजन बना, मैं अपने कमरे में आ गयी। मेरा चेहरा प्रसन्नता के कारण आज खिल उठा था। भोलेपन की छटा बिखेरता, साधारण रूप-रंग, फिर भी कितनी सराहना करते हैं ये मेरी। कितना विरोध किया था इनके घर वालों ने हमारी शादी का, किंतु इनकी ज़िद के आगे कोई कुछ नहीं कर पाया। मुझे अपनी जीवन-संगिनी बना, कभी भी मुझ पर किसी की उलाहना, व्यंग्य, आक्षेप, क्रोध और कटुता की आँच नहीं आने दी।

विचारों में डूबते-उतरते, जाने कितना समय व्यतीत हो गया। तभी घंटी बजी। ये आ गये थे। पूजा भी साथ थी। खाना खा कर पिता-पुत्री बहुत संतुष्ट दिखाई दिये। तभी नैपकिन से हाथ साफ़ करते हुए ये बोले, “चलो अब जल्दी से तैयार हो जाओ, तीन बजे वाले शो में चलना है।”

बढ़िया बनारसी साड़ी पहन, माथे पर बड़ी सी बिंदिया लगा, ढीला-ढाला जूड़ा बाँध, मैं जल्दी से तैयार हो गयी। चलते-चलते कुछ सोचते से ये बोले – “अरे एक बात बताना तो मैं भूल ही गया। वह जो कहानी तुमने भेजी थी न, ‘पुरस्कार’ शीर्षक से, कहानी प्रतियोगिता में, उसका परिणाम इसी महीने की दस तारीख़ को आने वाला है। क्या पता पहला पुरस्कार तुम्हारा ही हो।”

“हाँ, हो भी सकता है।”, मैं शरारत से बोली

पिक्चर के बाद काफ़ी समय तक हम इधर-उधर घूमते रहे। जब घर लौटे तो शाम के सात बज रहे थे। अभी घर का ताला खोल ही रहे थे कि मिसेज़ गुप्ता, जो हमारी पड़ोसन होने के साथ साथ बी.ऐ. में मेरी अध्यापिका भी रह चुकी थीं, सामने से आती दिखाई दीं।

“आइये न मैडम”, मैने ही उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा।
“अरे फिर कभी सही, अभी तो तुम कहीं बाहर से आ रही हो।”

पर मेरे अनुरोध पर वह अंदर आ गयीं। कुछ देर इधर-उधर की औपचारिकतापूर्ण बातें होती रहीं, फिर स्कूल, कालिजों की। तभी वह पूछ बैठीं-
“अरे चारू, तुम्हारी उस कहानी का क्या हुआ, जो तुमने प्रतियोगिता के लिये भेजी थी?”
“इसी महीने की दस तारीख़ को उसका परिणाम आने वाला है, तभी कुछ पता लगेगा।”, मैने उत्तर दिया।

चलो ठीक है, वैसे तुम लिखती बहुत अच्छा हो। मैने तो पढ़ी ही हैं तुम्हारी रचनायें और फिर इस कहानी का रफ़-प्रूफ़ तो मैने आशुतोष मुखर्जी को दिखाया था। बड़ी सराहना कर रहे थे।” थोड़ी देर बाद मैं चाय ले आयी। चाय के घूँट भरते हुए मिसेज़ गुप्ता कहने लगीं-
“सप्ताह भर पहले ही मैं मेरठ गयी थी। वहाँ के कालिज में विमल जी का ‘आधुनिक कहानी के नये आयाम’ के उपर लैक्चर अच्छा था। बाद में चाय के दौरान यूँ ही कविता-कहानियों पर बात चली तो बोले कि ‘कहानी प्रतियोगिता’ के निर्णायकों में से वह भी एक हैं। वह स्वयं तो बहुत अच्छे आलोचक और उपन्यासकार हैं।”

अब तक मैं प्रसन्न्बदन उनकी बातें सुन रही थी किंतु विमल जी का नाम सुन कर मेरे अन्दर-अन्दर तक धुआँ-धुआँ सा भर गया।

“कौन विमल जी मैडम?”, मैने आशंकित हो कर पूछा।
“अरे वही मेरठ युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर-विमल सक्सेना। अब तो वहीं हिंदी के विभागाध्यक्ष हैं।” बड़ी लापरवाही से मिसेज़ गुप्ता बोलीं और चिप्स खाने में व्यस्त हो गयीं।

“तो वही हैं विमल सक्सेना, जिसका मुझे संदेह था। विमल सक्सेना, विमल सक्सेना, ये दो शब्द मानो मन-मन भर के हथौड़े बन, मेरी समस्त सत्ता को हताहत कर रहे थे।

“क्या हुआ चारू, तुम क्यों घबराती हो? तुम्हारी कहानी का पहला ईनाम कोई नहीं रोक सकता। अच्छा, अब चलती हूँ। तुम्हारे अंकल क्लब से लौट आये होंगे।”, मुस्कुरा कर पीठ थपथपा कर वह वापिस चली गयीं।

दिन भर की खुशी पर मानो घड़ों पानी पड़ गया था। चेहरे पर बरसों बीमारी के भाव झलकने लगे थे। बुझे मन से उठी, कपड़े बदले। पूजा वहीं ड्राइंग रूम में ही सो गयी थी। उसे उठाकर बिस्तर पर डाला। सुधांशु कपड़े बदलते हुए फ़िल्म का कोई गीत गुनगुना रहे थे। मुझे देखते ही बोले-
“कहो चारू, कैसा रहा आज का दिन?”
“बहुत अच्छा”, कह कर मैने ऊपर आकाश की तरफ़ देखा। उजले चांद की मधुरिम किरणें सारे कमरे को रोशन कर रहीं थीं। कितना शांत, कितना सुंदर। पलट कर देखा, सुधांशु एकटक मुझे ही निहार रहे थे।
“क्यों क्या हुआ”, कुछ परेशानी भरे स्वर में सुधांशु ने पूछा।
“कुछ भी तो नहीं, बस थकान हो गयी है।”
“आओ, चलकर सो जाओ, देर भी बहुत हो गयी है।”

बत्ती बंद कर हम लेट गये। कुछ देर तक तो ये प्यार से मेरे बालों को सहलाते रहे, फिर जाने कब सो गये। किंतु मेरी आँखों में नींद लेश-मात्र को भी नहीं थी। मुड़ कर देखा, चंद्रमा अपने पूरे यौवन पर था, ठीक मेरी खिड़की के पास। अनायास मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा जैसे वह चांद न होकर, विमल का सुंदर, गौरवपूर्ण चेहरा है, उसकी कल्पना है, उसके ह्र्दय का उदगार है। अबूझ रोमांच से मैं रोमांचित हो उठी, लगा चंद्रमा की प्रत्येक किरण इंगित कर मुझे अपनी ओर बुला रही है। पास सोये सुधांशु का एक हाथ सिर के नीचे था तो दूसरा मेरी कमर के गिर्द। धीरे, बहुत धीरे से मैने वह स्नेहिल हाथ हटाया और उठ कर खिड़की के पास आ गयी।

अर्ध-रात्री की अपर निस्तब्धता, हर ओर एक अजीब सन्नाटा। किंतु मेरे अन्तर्मन की हलचल बहुत तीव्र थी। हर पल मानो एक-एक वर्ष बन मुझे वर्षों पीछे ले गया था। खिड़की के पास आरामकुर्सी खींच कर मैं वहीं अधलेटी सी बैठी, बाहर के शून्य को निहारती रही। उसी शून्य के गर्भ से उभरते कयी चित्र मेरे सामने आते चले गये। वर्षों पुराना वह क्लासरूम मेरे सम्मुख स्पष्ट हो गया, जिसकी प्रथम सीट पर मैं ही बैठा करती थी। एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा थी मैं। अपने स्वभाव, सादगी और शालीनता के कारण मैं अपने सहपाठियों, सहपाठिनों एवं अध्यापकों में प्रिय थी। उन्हीं अध्यापकों में एक थे – विमल सक्सेना। अदभुत व्यक्तित्व था उनका। उनकी विद्वता एवं विचारों का मैं मान करती थी।

हाउस टेस्ट में मेरा प्रथम स्थान आया। मेरी बहुत सराहना की उन्होने, जिस से मेरी लगन और प्रेरणा को बल मिला। एक दिन, फ़्री पीरियड में अपने सहपाठियों के अनुरोध पर मैं तन्मय भाव से अपना ही लिखा गीत गा रही थी। विमल जी कब क्लास में चले आये, मुझे पता नहीं चला। गीत की समाप्ति पर वह बोले –
“तुम ने लिखा है यह गीत?”
“यह सर”, मैने सकुचाते हुए कहा।
“सर, यह बहुत अच्छा लिखती है।”, रवीन्द्र और सुलेखा ने कहा। सर कुछ बोले नहीं एक गहरी द्रष्टी डाल कर रोल-काल लेने लगे। फिर हमेशा की तरह हमें पढ़ाया और जाते समय मुझे अपने कमरे में आने के लिये कह गये। उन से मिलने पर उन्होने मेरी रचनायें देखने का अनुरोध किया और भविष्य में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा दी। इसी तरह, आम दिनों की तरह दिन बीतते गये और देखते ही देखते छ: मास व्यतीत हो गये।

एक शाम, मैं अपने घर के बागीचे में पानी सींच रही थी। तभी देखा, विमल जी हमारे घर के गेट पर खड़े हैं। जिस नज़र से वह मुझे देख रहे थे, वह मेरे बहुत अंदर तक मुझे बेध गयी। वह नज़र औरों की नज़र से सर्वथा भिन्न थी। नल बंद कर मैं प्रसन्नतापूर्वक फाटक तक चली गयी।

“आइये न सर, यहाँ बाहर क्यों खड़े हैं?”
तभी भैया की आवाज़ ने मुझे चौंकाया –
“कौन है चारू?”
“मेरे सर हैं भैया, देखो तो।”

भैया बाहर आये और उन्हें सम्मान सहित अंदर लिवा ले गये। फिर माँ, भैया और सर बहुत देर तक आपस में बातें करते रहे। चाय-नाश्ता ले जब वह वापिस चले गये तो घर के सभी सदस्य उन्हीं की बातें करते रहे।

तभी पूजा की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हुई। वह पानी माँग रही थी। उठ कर उसे पानी पिलाया। सुधांशु की नींद भी उचट गयी थी। मैं पुन: उनके पास जा कर लेट गयी।

“अब कैसी तबियत है?”, सुधांशु ने पूछा।
“ठीक हूँ।”, सहज भाव से मैने कहा और आँखें बंद कर लीं

मैने थोड़ी देर के लिये सो जाना चाहा पर नींद फिर भी नहीं आयी। देखा चांद अब अस्ताचलगामी हो चला था। विमल का ध्यान फिर हो आया। उस दिन के बाद से अक्सर वे हमारे घर आने लगे। एक दिन मैं क्लास के बाद पैदल घर जा रही थी कि तभी एक बस मेरे पास आ कर रुकी और विमल जी उस से उतर कर चुप चाप मेरे साथ चलने लगे। मैं बड़ी हैरान थी।

“सर आप यहाँ क्यों उतर गये, यह बस तो आप को घर तक छोड़ देती।”
“तुम कुछ भी नहीं समझती क्या चारू?”
“सब समझती हूँ सर, शायद बरसाती मौसम देख कर आप का पैदल चलने को मन हो आया है। वैसे सर, आज का मौसम है बड़ा अच्छा। चलिये आज आप मेरे साथ हमारे घर चलिये।”
उन्होने एक लंबी आह भरी और मेरे साथ-साथ घर आ गये। माँ उन्हे देख कर बहुत प्रसन्न हुई। थोड़ी देर बाद उन्होने पकौड़े बनाये। हल्की-हल्की बूँदें पड़ने लगीं थीं सो भैया छाता ले कर काफ़ी दूर तक सर को छोड़ने गये।

दूसरे दिन से विमल जी सप्ताह भर के लिये दिखाई नहीं दिये। उनकी क्लास ब्रजेंद्र जी लेते रहे। एक शाम जब मैं डिपो से दूध लेकर आ रही थी तो देखा सड़क के उस पार विमल जी खड़े हैं। उन्हें देख, मैं उधर ही मुड़ गयी।

“अरे सर! आप कहाँ चले गये थे?”
“तो तुम्हें मेरी याद आती रही?”
इस अप्रत्याशित प्रश्न को सुनकर मैं चौंकी, पर प्रकट में कहा – “याद तो नहीं आयी सर, क्यों कि ब्रजेंद्र जी आपके बदले पढ़ाते रहे, पर सर, वह आप जैसा अच्छा नहीं पढ़ा पाते।”
“चारू, बहुत बचपना है तुम में, तुम कुछ भी जानने समझने की कोशिश क्यों नहीं करतीं?”, वह कुछ इस प्रकार बोले मानो मुझ से रुष्ट हो गये हों।
“चारू, तुम से कुछ बात करनी है”, वह पुन: बोले।
“बात करनी है तो घर चलिये। वहाँ माँ, भैया से……पर मुझे बीच में ही टोक कर आवेशपूर्ण शब्दों में कहने लगे – “तुम बहुत मूर्ख हो, मुझे तुम्हारे माँ, भाई से नहीं, तुम से बात करनी है।”
“तो-तो फिर कीजिये न”, मैने बैठे हुए स्वर में घबरा कर कहा।
सहसा उन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया और बड़े ही स्नेह से कहा – “सुनो चारू, मैं……मैं तुम से शादी करना चाहता हूँ।”
“शादी! मुझसे!”, मैं मानो चेतना-शून्य हो गयी।
यह क्या घटित हो गया। इतने विद्वान, मुझ से इतनी बड़ी उम्र के सर, मुझ से शादी करना चाहते हैं। मेरा अन्तर्मन ऐसे ही अनेकों प्रश्नों के भँवरजाल में उलझ कर रह गया पर प्रत्यक्ष में मैं मात्र इतना ही कह पायी –
“लेकिन सर, मैने तो ऐसा कभी सोचा ही नहीं।”

मेरी सारी चपलता, उल्लास, अनमनापन, जाने कहाँ लुप्त हो गया। एक अन्जाना सा बोझ मन-मस्तिष्क पर छा गया था। कुछ दूर तो हम साथ-साथ चलते रहे, एक दूसरे से सर्वथा अन्जान बने। फिर मैं अपने घर लौट आयी। सड़क के मोड़ पर खड़े सर बड़ी देर तक मुझे देखते रहे थे। पर मैने जैसे सब कुछ अनदेखा कर दिया था। घर पहुँच कर माँ से सारी बातें कह सुनाईं।
“कैसी ध्रष्टतापूर्ण बातें हैं न ये माँ?”
पर मेरी आशा के विपरीत, माँ बहुत प्रसन्न हुईं।
“नहीं बेटा, यह तो हमारे लिये बहुत ही खुशी की बात है। इतना पढ़ा-लिखा, सुंदर, स्वस्थ लड़का स्वयं तुम से शादी की बात कर रहा है। इतने अच्छे लड़के हैं ही कितने?”

मेरे मन की कौन सुनता? मैं विमल जी का सम्मान करती थी, इसलिये कि वह विद्वान पुरुष थे, इसलिये नहीं कि मैं उनसे प्रेम करती थी।

अगली सुबह जब मैं युनिवर्सिटी पहुंची तो न मुझ में पहले जैसा उत्साह था और न ही किसी प्रकार की आशा अथवा निराशा की भावना। किंतु सर का सामना करने की शक्ति मुझ में नहीं थी। जिस रास्ते वह चलते, मैने उस रास्ते पर चलना छोड़ दिया। मन बहुत ही बेचैन और बुझा-बुझा रहने लगा। इसी ऊहा-पोह में कुछ दिन व्यतीत हो गये। एक दिन लाइब्रेरी में बैठी थी तभी विनीत आ कर मेरे पास बैठ गया –
“हैलो चारू, कहो तुम्हारा थीसिस कैसा चल रहा है?” फिर कुछ रुक कर कहने लगा, “तुम्हारे गाइड विमल जी तो बहुत इंटेलीजेंट हैं, बहुत अच्छा काम करवा रहे होंगे। पर भाई, हमें तो उन्होने चक्कर में डाल दिया। सोचा था, आज लाइब्रेरी में बैठ कर एक चैप्टर पूरा कर लूँगा पर वह कहने लगे, भाई विनीत, तुम्हें दिल्ली जाना होगा। उनकी पत्नी आ रही हैं न्। बच्चा और माँ साथ हैं। दिल्ली से रिसीव करूँगा। चलूँ फिर, ढाई बजे वाली बस पकड़नी है।”

विनीत चला गया पर आशंकाओं का एक गहरा जाल मेरे चारों ओर फैला गया। तो विमल जी विवाहित हैं फिर मुझ से शादी का प्रस्ताव क्यों? छि: कितने निक्रष्ट हैं उनके विचार्। कैसा-कैसा सा होने लगा मेरा मन। ओह! मैं क्या समझती थी उन्हें, पर…ऐसा नहीं करना चाहिये था उन्हें। पर तभी लगा, एक भारी बोझ दिमाग़ से उतर गया। ऐसे व्यक्ति से भला मैं क्यों शादी करूँगी। भले ही वह कितना नामी और विद्वान क्यों न हो। घर लौट कर जब माँ को यह बात बताई तो वह भी अचंभित रह गयी।

एक दिन घर लौटने पर देखा, एक प्रौढ़ा माँ के पास बैठी हैं। मुझे देख कर बोलीं – “तो यही है तुम्हारी बेटी जिसने मेरे इतने लायक बेटे की मन की शान्ति छीन ली है।” पुन: माँ को सम्बोधित करती हुई बोलीं, “सुनो बहन, इन्कार न करो। मेरा बेटा लाखों में एक है। अपनी पहली गँवार और बदसूरत पत्नी से वह कोई संबंध नहीं रखेगा।”

पर मेरी माँ ने यह संबंध स्वीकार नहीं किया। विमल जी की माँ चली गयीं पर मेरा शांत मन परेशानियों से भर गया था। इस बार का मेरा परीक्षाफल भी अच्छा नहीं रहा। विमल जी को देख कर मेरा मन दुविधाओं से भर उठता।

हमारी वार्षिक परीक्षा निकट थी। परीक्षा फ़ार्म भर कर मैं अकेली ही घर लौट रही थी, तभी विमल जी जाने कहाँ से आ गये। तपती दोपहर, सुनसान सड़क, आगे बढ़ कर उन्होने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“चारू, तुम्हें मुझ से शादी करनी होगी, अभी, इसी समय।”
“सर आप सोचते क्यों नहीं, आप की पत्नी है, बेटा है। मेरा ऐसा करना उनके प्रति घोर अन्याय है। ऐसा नहीं हो सकता। आप मेरे गुरू हैं, मैं आप के प्रति ऐसा सोच भी नहीं सकती।”
“कुछ भी हो चारू, यह विवाह अवश्य होगा।”

विमल जी प्राय: घसीटते से मुझे सामने से आती रिक्शा की ओर ले चले। मैं पागल हो उठी। भूल गयी उनका महत्व, उनकी पोज़िशन और उनका अस्तित्व। क्रोध के वशीभूत हो मैने उनका हाथ काट लिया। मेरा हाथ स्वत: छूट गया। तभी पीड़ा से कराहते हुए उन्होने कहा –
“ठीक है चारू, तुम भी देखना, शूट कर लूँगा मैं अपने आप को। देख लेना चारू तुम, देख लेना।”

पर मैने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। परेशान, घबराई, जब मैं घर पहुँची तो भोली माँ हैरान, परेशान कुछ समझ नहीं पाई। माँ के आँचल में सिमट, मैं सिसकियाँ भरती रही, तड़पती रही। एक ओर अन्याय के प्रति घोर विरोध की भावना, पर पत्नी और बच्चे के प्रति करूणा और दया के भाव। फिर यह अबूझ सी छटपटाहट क्यों? उनकी आत्म्हत्या कर लेने की बात का अकारण भय क्यों? विमल जी के प्रति किये गये व्यवहार के प्रति क्षोभ और ग्लानि क्यों? क्या मैं उन्हें चाहने लगी थी? क्या मुझे उनसे विवाह कर लेना चाहिये? आह! लगा साँस घुट रही है और दूर-दूर तक अनेकानेक कंटीले कैक्टस उग आये हैं।

सुबह जब आँख खुली तो काफ़ी दिन चढ़ आया था। सुधांशु ने ही दो कप चाय बनाकर मुझे जगाया। चाय के कप ले हम बाहर लान में आ बैठे।
“सुनो जी, वह जो कहानी प्रतियोगिता का निर्णायक मंडल है न, उसमें विमल सक्सेना भी हैं।”
“वही विमल सक्सेना तो नहीं जो कभी तुम्हारे अध्यापक थे और तुम्हारे दिवाने भी।”, इन्होनें शरारत से कहा।
"हाँ, हाँ वही।”
"बस, फिर तो तुम्हारा इनाम पक्का रहा। तुम्हारा नाम पढ़ते ही प्रथम पुरस्कार तुम्हारे नाम कर देंगे।”
“चलो हटो, मज़ाक मत करो”, मैने चिढ़कर कहा। वह हँसते हुए आफ़िस के लिये तैयार होने लगे। कुछ समय उपरांत मात्र मैं रह गयी, अपनी यादों के सहारे।

कितना टूट गये थे विमल जी मेरे इस व्यवहार से। पर उसके बाद उन्होने कभी भी मुझ से इस विषय में कोई बात नहीं की। थीसिस का काम कराते समय जो कुछ भी समझाना होता अथवा चेक करना होता, नीची निगाह किये कर देते और शीघ्र उठ कर चले जाते। मुझे उनका यह शुष्क व्यवहार बहुत अखरता। अंदर एक टीस सी उठती। कितनी दूरी आ गयी थी हम दोनो के बीच, और ऐसा होना मेरे लिये हितकर ही था। फिर भी न जाने क्यों मन चाहता कि वह पहले की तरह ही हसें, बोलें।

अपने एकाकी क्षणों में कभी-कभी यह विचार भी आता कि उन से विवाह करने से मेरी प्रतिभा को, मेरी लेखनी को एक विद्वान पुरुष का संबल मिल सकता है। कितने अच्छे साहित्यकार हैं विमल जी। वह स्वयं भी तो मुझे एक प्रतिभाशाली लेखिका के रूप में देखना चाहते थे। पर फिर मेरा स्वार्थी मन मुझे धिक्कारने लगता। किसी के आंसुओं और दु:खों की नींव पर टिका सुख क्या चिरस्थायी हो सकता है? जाने कैसे प्रलाप में मैं जीने लगी थी। एम.ए. फ़ाइनल की परीक्षा को अभी दो महीने शेष थे, तभी विमल जी की बदली हो गयी। ब्रजेंद्र जी हमारी क्लास लेते रहे और इसी प्रकार मैने परीक्षा दे दी।

सुधांशु हमारी ही युनिवर्सिटी के मेधावी छात्रों में से थे और मन ही मन मुझे चाहते भी थे। कुछ समय बाद हम दोनो का विवाह हो गया। विवाह से पूर्व मैने विमल जी के बारे में इन्हें सब कुछ बता दिया था। कितने सहज रूप से हमारा घर-परिवार चल रहा था। कितना अटूट विश्वास है इन्हें मुझ पर। और फिर मैं कौन सी विमल से जुड़ी हुई हूँ। पर यह मुझे कुछ दिनों से क्या हो गया है? विमल जी की कल्पना सुखकर क्यों प्रतीत होने लगी है?

मेरे पति हैं, एक सच्चे और नेक इन्सान हैं, परंतु क्लब, पार्टियों, सभा, सम्मेलनों से इन्हें चिढ़ है। कभी सोचती कि यदि मेरे पति का पूरा प्रोत्साहन व सहयोग मुझे मिलता तो आज मैं एक प्रतिष्ठित लेखिका होती। कभी-कभी ऊहापोह में बौखला कर मैं माथा पकड़कर बैठ जाती। एकांत के क्षण मुझे बड़े ही कष्टकर प्रतीत होते। सोचती, क्या विमल जी अब भी मुझे चाहते होंगे? उन्होने तो मेरे वियोग में मर जाने की बात कही थी न, पर कहाँ मर पाये। युनिवर्सिटी की अच्छी पोस्ट पर हैं। अब तक अवश्य मुझे भूल गये होंगे। ठीक ही तो है। किसी के न मिलने पर कोई मर तो नहीं जाता। फिर मैं क्यों परेशान हूँ? इतने वर्षों बाद इन बेकार की बातों में उलझना पागलपन के सिवा और कुछ नहीं है।

पर फिर विचारधारा ने करवट बदली। विमल जी ने मेरी कहानी पढ़ी होगी। मेरा नाम पढ़कर कुछ तो कौंधा होगा उनके मन मस्तिष्क में। पुराने दिन तो याद आये होंगे। कितना चाहते थे मुझे। निर्णायक कमेटी के चेयरमैन हैं, प्रथम पुरस्कार मेरा ही होना चहिये। ऐसा सोच कर मैने अपने आप को आश्वस्त कर लिया। किंतु मेरा प्रथम तो क्या दूसरे अथवा तीसरे नंबर का भी पुरस्कार नहीं था। प्रथम पुरस्कार किसी रूही बैनर्जी का था।

“देखा तुमने, कुछ भी नहीं मिला मुझे।”, मैं रूआंसी हो आयी थी।
“अरे भाई, तो क्या हुआ, फिर कभी निकल आयेगा कोई इनाम।”
“पर……विमल जी के होते हुए!”
“ओहो, हो सकता है तुम्हारा ध्यान उनके दिमाग से उतर गया हो। कितने साल हो गये हैं। कभी मिलना भी नहीं हुआ”, सुधांशु बड़े प्यार से मुझे समझा रहे थे। पर न जाने क्यों मुझे उन पर क्रोध आने लगा था। चिढ़ सी होने लगी थी उन से। ऊँह, कुछ समझते तो हैं नहीं, बस उपदेश देने लगते हैं। मेरी मानसिक दशा का इन्हें क्या पता। सारा दिन बस घर-ग्रहस्थी में जुटे रहो। ऊपर-ऊपर से कह दिया, बहुत अच्छा लिखती हो। ख़ाक अच्छा लिखती हूँ। अच्छा लिखती तो आज ऐसा न होता। न कभी कवि सम्मेलनों में ले कर गये, न साहित्यिक समारोहों में। बस पिंजरे की चिड़िया बना कर रखा है। सारा दोष इनका है, केवल इनका। विमल जी भी क्या करते। कोई कमी रह गयी होगी कथानक में। कितना उत्क्र्ष्ट प्रेम था उनका। कहा करते थे –
“चारू, व्यक्ति का बाह्य रूप तो छलावा मात्र है। वास्तविक सुंदरता तो मन की हुआ करती है और तुम्हारा मन अतीव सुंदर है।”

पर मैं अपने कलाकार मन से पूर्ण साक्षात्कार कब कर पाई। बस कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात ग्रहस्थी में ही खटती रही।

कैसा मानसिक आघात था यह्। सुधांशु से बात करने की इच्छा न होती। वे मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार पर मेरे प्रति क्रोध के स्थान पर मुझे और अधिक प्रेम देने की चेष्टा करते। पर मुझे उनकी हर बात में बनावटीपन दिखाई देने लगा था। अपने एकांत के क्षणों में मैं विद्रोहिणी हो उठती।

साँझ घिर आयी थी। हम दोनो चुप-चाप बाहर लान में टहल रहे थे। तभी आशुतोष जी आ गये।
“कहो चारू, कैसी हो? भाई तुम्हारी कहानी का हमें बड़ा दुख है”, लान चेयर पर बैठते हुए उन्होने कहा।
“कोई बात नहीं मि. मुखर्जी, यह सब तो चाँस की बात है”, इन्होने कहा।
“नहीं-नहीं सुधांशु जी, इसी बात का तो दुख है कि यह चाँस की बात नहीं है। शायद आप नहीं जानते कि मैं भी निर्णायक कमेटी का सदस्य था। एक थे अपने मुकुंद क्रपलानी, ‘मानसरोवर’ के संपादक्। विमल सक्सेना थे निर्णायक कमेटी के चेयर्मैन। सभी कहनियों में चारू की कहानी सर्वोत्तम थी। मुकुंद जी और मैं इसी कहानी के प्रथम पुरस्कार के पक्ष में थे किंतु विमल जी ने इसका विरोध किया और इस प्रकार इनकी कहानी पुरस्क्रत नहीं हो पायी। एक प्रभावशाली व्यक्ति का विरोध करना हमारे लिये कठिन था, सो हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाये। किंतु एक बात समझ में नहीं आती कि ऐसा उन्होने क्यों किया?”
“छोड़िये भी मुखर्जी साहब इस बात को, क्या फ़र्क पड़ता है इस से। कलाकार की कला तो पूर्णिमा के चाँद सी सर्वदा उदभासित होती रहती है, उस में दाग़ थोड़े ही लग जाता है।”

मैनें चौंक कर सुधांशु की ओर देखा, पर चुप बैठी रही। आशुतोष जी के लिये यह एक विस्मित कर देने वाली घटना थी। किंतु मेरे सम्मुख विमल जी का वास्तविक स्वरूप स्पष्ट हो चला था। यह पुरस्कार न दे कर उन्होने मुझ से अपनी अवहेलना, अपने प्रति किये गये निरादर का बदला लिया था। किंतु सच्चा प्रेम अनुदान तो नहीं चाहता। महानता की बातें करने वाले विमल सक्सेना, आज तुम बहुत छोटे हो गये हो मेरी द्रष्टी में।

मि. मुखर्जी जा चुके थे। आज अपने सुधांशु के प्रति मेरा विद्रोही मन पूर्णत: शांत हो गया था। सारे भ्रमजाल मिट गये थे। सारी विरोधी भावनाओं और आक्षेपों का अंत हो गया था। मेरा अन्तर्मन मुझे धिककारने लगा था। अपने देवतातुल्य पति की अवहेलना करती रही मैं, इतने दिन। मेरा वास्तविक अमूल्य पुरस्कार तो मुझे अपने पति के रूप में वर्षों पूर्व मिल चुका था। फिर अन्य किसी भी प्रकार के पुरस्कार की लालसा क्यों? अकारण ही व्यर्थ की भटकन क्यों? सहसा मैं पति के अंग से लग, फूट-फूट कर रो पड़ी।
पश्चाताप के आँसुओं से मन का समस्त मैल धुल गया था।
अहस्ताक्षरित संधिपत्र (Short Stories), इतिहास शोध-संस्थान, नयी दिल्ली, 1994, भाषा विभाग, पंजाब, द्वारा प्रदत्त वित्तीय सहायता से प्रकाशित

Friday, June 1, 2007

अहस्ताक्षरित संधिपत्र




एयर बैग को कंधे से लगाये, लगभग दौड़ता हुआ वह first-class के compartment में चढ़ गया। जनवरी के महीने में भी उसका सारा शरीर पसीने से तर हो रहा था और साँस फूली हुई थी। ओह ! कहीं ट्रेन छूट जाती तो…?

रात्री के ग्यारह बज रहे थे। कुछ पल तक निरीक्षणात्मक द्रष्टी से वह इधर-उधर देखता रहा और खड़े – खड़े ही रूमाल से चेहरे का पसीना पोंछता रहा। रात्रि का गहन अंधकार हर ओर फैला हुआ था। मात्र गाड़ी की छुक – छुक की ध्वनि ह्रदय की धड़कन का साथ दे रही थी और उसके साथ – साथ जाने कितनी अस्फ़ुट ध्वनियाँ सर्राटे के वेग से मिली – जुली अनचाहे ही सुनाई दे जाती थीं।

तभी वह झुका, बैग से Rider Haggard का “She” निकाल कर सीट पर जा बैठा और पढ़ने लगा। आग के झरने में नहा कर सदाबहार रहने वाली नवयौवना ‘शी’ कुछ क्षणों तक उसकी कल्पना में साकार हो मुस्कुराती रही जो अपने प्रेमी को भी अग्नि – कुंड में नहला कर चिर यौवन प्राप्त अमर पुरुष बना देना चाहती है। ‘यदि ऐसा कहीं संभव हो जाये तो मनुष्य विक्षिप्त हो जाये’, उसका अन्तर्मन उसे कह रहा था – यह दु:खपूर्ण संसार और अमरत्व पाने की ऐसी मोहक भूख…कितना वोरोधाभास है दोनो में।

अब तक पढ़ते – पढ़ते वह थक चुका था किंतु नींद आँखों में लेश – मात्र को भी न थी। जेब से सिगरेट निकाल, देर तक उसके कश खींचता रहा और दूर कहीं विलीन होते उसके धुएं के छल्लों के साथ आँख मिचौनी खेलता रहा।
सहसा उसकी द्रष्टि सामने पड़े सूटकेस पर पड़ी। सुनहरे शब्दों से लिखा ‘नीला दत्त’ क्षणांश को उसे अंदर तक बेध गया। ‘नीला दत्त’, कौन नीला दत्त?

साथ ही सीट पर सोई महिला ने अनजाने ही करवट ली और उसका गदराया सलोना हाथ उसके घुटनों में आ लगा। विस्फ़रित नेत्रों से जाने कब तक वह उसे एकटक निहारता रहा। उसे अपनी आँखों पर सहज विश्वास नहीं हो पा रहा था। हतवाक्य हतबुध्धी – सा वह जाने कब तक यूँ ही बैठा रहा। हठात उसने बैग का मुँह दूसरी तरफ़ कर दिया और उठने को हुआ किंतु उसे लगा कि जैसे उसके पैरों में भारी बेड़ियां डाल दी गयी हैं। चाह कर भी वह उठ नहीं पाया।

उसका एक हाथ अब तक नीला के हाथों में था। लेटे – लेटे ही वह मुस्कुराती आँखों से देख रही थी और उसके बर्फ़ हुए हाथ धीरे – धीरे सहला रही थी। उसकी अधखुली आँखों में एक अछूता सा प्रश्न था। मानो वह पूछ रही हो –


“डू यू एवर रेमेम्बर मी सुनील?”

जाने कब तक वह सकुचाया सा खड़ा रहा। तभी जैसे उसकी चेतना लौटी;
“ओह ! नीला ही तो हो न तुम, पर यहाँ कैसे, कहाँ जा रही हो?”
“बहुत घबरा गये हो मुझे देख कर, अच्छा रुको, मैं तुम्हें चाय पिलाती हूँ।“

चाय का गिलास उसके हाथों में दे कर वह देर तक उसे चाय सिप करते देखती रही। तभी कुछ सोचती हुई सी बोली –
“तुम कुछ पूछ रहे थे क्या?”
हाँ, यही कि आज कल तुम कहाँ हो, क्या करती हो।“

वह कुछ बोली नहीं। माथे पर बिखर आई लटों को पीछे की ओर संभालते हुए मुस्कुराती रही। उसकी आँखें सुनील के उधड़ गये कालर के कोने पर टिकी थीं।

चाय का अन्तिम घूंट भरने तक सुनील कुछ विचलित हो उठा था।
“तुम ने कुछ बताया नहीं नीला, तुम्…”

एक दीर्घ नि:श्वास ले वह उठ खड़ी हुई और सुनील के निकट आ बैठी।
“मेरे बारे में जानने को बहुत इच्छुक हो, क्यों?” फिर कुछ रुक कर “दिल्ली में हूँ, माडलिन्ग करती हूँ। बहुत ही ग्लैमरस लाइफ़ है। नये – नये चेहरे, नयी भाव – भंगिमाएं, नवीन रूप – रेखायें। और फिर इन सब से ऊपर है व्यस्तता। व्यस्तता, जो अतीत की कड़वी, मीठी स्म्रितियों पर अंकुश लगाये रहती है, वह अंकुश जो मुझे पैरों पर खड़ा होना सिखाता है। पर तुम्हें इस से क्या? तुमने तो मुझे हमेशा-हमेशा के लिये अंधेरों के गर्त में समाहित होने के लिये छोड़ दिया था न। बोलो, क्या तुम नहीं चाहते थे कि मैं बरबाद हो जाऊं और तुम सुखपूर्वक जी सको।“ वह अतयंत भावुक हो उठी थी।

“नहीं नीला, ऐसा कुछ भी नहीं था”, वह समझौते के स्वर में बोला। पर वह उठ खड़ी हुई और खिड़की के निकट जा कर खड़ी हो गयी। उठते समय शाल उसके कंधों से नीचे आ गिरा। लाल ड्रेन पाइप पैंट और पीली स्कीवी में वह आज भी उतनी ही मोहक लग रही थी जितनी कि आज से पाँच वर्ष पूर्व्।

मंत्र – मुग्ध सा वह उसकी तरफ़ देखता रहा, बोला कुछ नहीं। कूपे का सहज एकांत उसे सुखद प्रतीत होने लगा। मात्र दो सहयात्री और वातावरण की अपार निस्तब्धता। उत्तेजना उसके ह्रदय पर थपथपाने लगी, किंतु विगत की कड़वाहट में वह सोंधी गमगमाहट दब कर रह गयी।

फिर भी मानस स्म्रितियों के आकाश को बेंध, उस विगत को बांध लेना चाहता था जो उसका अपना था। कितना कुछ देना चाहा था उसने अपनी पत्नी नीला को – ह्रदय का सम्पूर्ण प्यार एवं अटूट विश्वास्। किंतु क्या वह उस प्रेम का अनुदान कर पाई? जीवन में जो कुछ भी था, मात्र औपचारिकता थी, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं।

लाइटर निकाल कर सिगरेट सुलगा लिया उस ने और बाहर अंधेरे में कुछ ढूंढने की निरर्थक चेष्टा करने लगा। नीला अब तक सीट पर बैठ चुकी थी और एकटक उसी की ओर देख रही थी।
“तो तुम ने सिगरेट पीनी छोड़ी नहीं। इधर तुम्हारा स्वास्थ्य भी कुछ ठीक नहीं लगता।“

कुछ पलों तक वह सिगरेट के धुयें को दूर कहीं लुप्त होते देखता रहा, विस्म्रित सा। कैसा भ्रमजाल था वह जिस में वह वर्षों तक उलझा रहा। नागमणि का सा अस्तित्व लिये नीला उसे प्रतिपल छ्लती रही और कातर म्रग-छौने सा हर क्षण मर्दित होता रहा था वह्। सहसा जाग्रत होकर वह पूछ बैठा, “राजीव और शेखर कैसे हैं, तुम्हारे पास तो आते होंगे न?” इस अप्रत्याशित प्रश्न से नीला चौंकी, सचेत हो कुछ क्षणों तक सुनील की आँखों में झांकती रही।

“लगता है, तुम अब भी मुझ से नाराज़ हो, तुमने अब तक मुझे क्षमा नहीं किया। सच कहना सुनील, इन बीते वर्षों में क्या कभी मेरी याद नहीं आयी तुम्हें?”

“ऐसा था ही क्या नीला जिसे याद किया जा सके। उपेक्षा, उपहास और अनादर। मैं नहीं समझता इस सब में याद रखने योग्य कुछ है। फिर भी, बरसों तक घुटन, क्षोभ और पीड़ा के अनवरत तपते गरल को पी कर भी मैं कहाँ, किस छोर से अब तक तुमसे जुड़ा हूँ कह नहीं सकता, और क्यों? यह मैं स्वयं नहीं जानता।“

सहसा चौंक कर, “लगता है कोई स्टेशन आ रहा है – कुछ लोगी क्या?”
“नो थैंक्स।“
“कुछ तो”, सुनील के स्वर में कुछ आग्रह था।
“नहीं, रहने दो।“ “हाँ सुनो, तुम्हें क्या भूल गयीं वे रातें जब हम झील के किनारे रेत की नैया पर बैठ कर घंटों चाँदनी का गीत गाया करते थे। कितना सुंदर गाते थे न तुम। विशेष कर वह गीत –

“अंधेरों की चादर उठाकर तो देखो,
सितारों की मोहक मधुर रोशनी है।
धरा से गगन तक सुषमा ही सुषमा
नवल चंद्रमा की धवल चाँदनी है।“


“सच, तो तुम्हें आज भी याद है वह गीत?”
“क्यों नहीं”, मधुर विकम्पित शब्दों में नीला के अधर हौले से खुले।
“और तुम रोती कितना अच्छा थीं न।“
“मैं रोती थी, पर भला क्यों?”
“अच्छा जी ! भूल गयी वह शाम, जब उस बीहड़ घने जंगल में एक पुराने खंडहर के पीछे…तभी वाक्य पूरा होने से पहले ही नीला ने आवेश में आ कर दो तीन धौल सुनील की पीठ पर जमा दिये।
“नटखट कहीं के, शैतान…” हंसते हंसते मानों वह सब कुछ भूल गयी थी, भूलती जा रही थी।

सहसा चैतन्य हो कर, “आई एम सो सौरी सुनील, मुझे ऐसा नहीं करना चहिये था।“ नीला की आँखें स्वप्निल सी हो रही थीं और चेहरा गहन विषाद में डूबता जा रहा था।

“जीवन में अनजाने, अनचाहे ही कभी-कभी कुछ ऐसा घट जाता है जिस की हम कल्पना तक नहीं करते।“
“किंतु वास्तविकता को झुठलाया भी तो नहीं जा सकता, नीला।“
“नहीं नहीं, ये सब झूठे आक्षेप हैं मुझ पर। जो कुछ भी हुआ, मात्र तुम्हारे भ्रम के कारण, अन्यथा मुझ में कोई कमी नहीं थी।“
“तभी तो तुम्हारे चाहने वालों की भी कभी कमी नहीं रही।“, सुनील के चेहरे पर उपेक्षा के भाव स्पष्ट थे जो नीला से छुपे नहीं रहे।
“ओह शट अप”, फिर थोड़ी शांत होते हुए वह स्वत: बुदबुदाई, “आज बरसों बाद हम मिले हैं, क्या लड़ने-झगड़ने के लिये, एक मित्र की तरह ट्रीट करो मुझे”।

कुछ समय तक दोनो चुप रहे।


“कहो क्या करते हो आजकल, वहीं लखनऊ में हो या कहीं और?”, नीला का स्वर था।
“वहीं हूँ, अपना बिज़नेस है, लाखों का लेन-देन है, किंतु जीवन की वास्तविक शांति और सुख मुझ से कोसों दूर है। लगता है जैसे सब कुछ निरर्थक है…”

सहसा नीला का मुक्त हास्य उसे चौंका गया।


“हंसती हो?”
“ओह ! सुनील, आई कैन नाट बिलीव कि तुम ऐसी बात करोगे। तुम जो मुझे जीवन की सार्थकता समझाते थे। हाऊ स्ट्रेंज्।“ और वह जाने कितनी देर तक यूँ ही हँसती चली गयी और हँसते हँसते उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये।

“बहुत सैन्टीमेंटल हो गयी हो नीला और सैन्सिटिव भी। पहले तो ऐसी न थी।“
“तुम भी तो सुनील्…अच्छा कहो अभी तक शादी क्यों नहीं की?”
“तुम ने कर ली क्या?”
“नहीं, कभी सोचा ही नहीं इस विषय में और फिर विगत वैवाहिक जीवन के वे पाँच वर्ष यदा-कदा haunt तो करते ही हैं न्।“
“मुक्ता की शादी तो हो चुकी होगी अब तक?”
“हाँ हुई तो, उसी अपने राजीव से।“

सहज बैठे सुनील का अस्तित्व मानों इन शब्दों…अपने राजीव… से अन्दर तक खंडित होता चला गया। वह उठ खड़ा हुआ। उसे लगा, वह असंख्य नागों के पाश में जकड़ दिया गया है और उनका वह ज़हरीला दंश धीरे-धीरे उसकी समस्त सत्ता को तिरोहित करता चला जा रहा है। आह ! राजीव और शेखर, ये दो नाम वर्षों तक उसके समस्त पौरुष को आहत करते चले गये हैं; जब तब कल्पना में साकार हो उसकी उपेक्षा करते हैं।

सीमा और मर्यादा के महल को खँडहर होते वह कब तक देख सकता था। कुंठाग्रस्त जीवन कब तक जीता, भ्रष्टा पत्नि के साहचर्य को कब तक स्वीकरता, संबंध विच्छेद ही उसकी नियति थी। इस से पूर्व कि कोइ तीसरा राहु उसके जीवन को ग्रसे, वह नीला से सदा-सदा के लिये विलग हो गया था। नीला ने भी साथ रहने का कोई झूठा प्रदर्शन नहीं किया था। कितने ही सहज रूप से ग्रहस्थी की टूटती-जुड़ती कड़ियाँ हमेशा-हमेशा के लिये समाप्त हो गयीं थीं। यह आश्चर्यजनक विच्छेद सुखद था अथवा दु:खद, इस का निर्णय वह अब तक नहीं कर पाया।

सहेज कर रखे हुए ब्लाउज़ के टूटे बटन, जूड़े की सुई और कभी मेले में खरीदी गयी हाथीदाँत की चूड़ियों के सफ़ेद जोड़े – स्म्रतियों के खुले आकाश में धवल कपोतों के सद्रश आज भी रह-रह कर उस से कुछ सवाल किया करते हैं, जिनका उत्तर संभवत: उसके पास नहीं है।

“अच्छा नीला कहो, क्या तुम्हें कभी अकेलापन नहीं महसूस होता?” नीला के निकट बैठते हुए उसने प्रश्न किया।

बहुत देर तक उंगली में पड़ी प्लेटिनम की अंगूठी को इधर-उधर घुमाती रही। बोली कुछ नहीं। सुचारू रूप से तराशे गये नाखून उसकी सुद्रढ़ता के परिचायक थे; हल्के शेड की नेल-पालिश उस पर बड़ी अच्छी लग रही थी। उसकी लंबी उँगलियॉ अब तक अंगूठी से उलझी हुई थीं।

फिर धीरे से…”कयी-कयी बार बहुत निराश हो जाती हूँ सुनील्। नाम, ग्लैमर, रूप का जादू, सब बहुत फीका-फीका लगने लगता है। अनेकों बार उन सुद्रढ़ हाथों की कामना करती हूँ जो केवल मेरे हों और हर क्षण मुझे सहेज कर मेरा संरक्षण कर सकें। पर नहीं, मैं इसके योग्य कहाँ। आज आभास होता है कि जीवन की वास्तविक प्रसन्नता उन्हीं क्षणों में निहित थी जो क्षण तुम से जुड़े थे, उन वर्षों में थी जो वर्ष हम दोनों के थे। यद्यपि हम उस समय के साथ न्याय नहीं कर सके, उसका सदुपयोग नहीं कर सके। कुछ भी हो, आज वही अतीत मेरा अपना है और तुम सुनील, तुम, तुम्हारे लिये क्या कहूँ।“

“उस सब की ज़िम्मेदार तुम हो नीला तुम, मैं नहीं।“
“कुछ भी कह सकते हो”, बैग में से नन्हा रेशमी रूमाल निकाल कर वह अपनी आँखें पोंछने लगी।
“अरे, यह वही रूमाल है न जो…”
सुनील का वाक्य पूरा होने से पहले ही नीला मुस्कुराई, एसा लगा मानो बादलों भरे आकाश में इन्द्रधनुष चमक उठा हो।
“हाँ, वही जो तुमने मेरी 25वीं वर्षगांठ पर भेंट स्वरूप दिया था – साड़ी के साथ, हल्के पीले रंग की साड़ी, काले बार्डर वाली, याद है न। तुम समझते होगे कि एक दूसरे से विलग हो जाने पर स्म्रतियां फूल-कलियों की तरह हवा के झोंके में समय की प्रताड़ना सहते-सहते इधर-उधर बिखर जाती हैं, हमेशा-हमेशा के लिये समाप्त हो जाने के लिये, पर सुनील, तुम क्या समझोगे। याद हमेशा सजग रहती है, साथ रहती है किसी न किसी रूप में। तुम से विलग हो, तुम्हारे अभाव ने जीवन की विचारधारा को ही बदल दिया। कुछ समय तक तो मैने स्वयं को पूर्ण रूप से स्वतंत्र पाया। तब शेखर व राजीव मुझ से खुल कर मिलने लगे। एसा आभास होता था, जीवन की वास्तविक खुशी और सुख बस वही है। सुरमयी सांझें और मेरी हर रात स्वप्निल, मादक और झील के झिलमिलाते जल में डूबती-उतरती पनडुब्बी के समान मोहक हो गयी थी। इसी बीच रमन शर्मा से मेरी भेंट हुई। बहुत समय तक हम दोनों के बीच प्रेम नाटक भी चलता रहा। उसने मेरे सामने विवाह का प्रस्ताव भी रखा। किंतु तुम से टूट कर भी मैं, कहीं न कहीं तुमसे जुड़ी हुई थी; उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया मैने और हमेशा के लिये दूर हो गयी। जीवन की एक-रसता से ऊब कर मैं तुम से दूर चली गयी थी। राग-रंग की महफ़िल भी अधिक देर तक साथ न दे सकी। जीवन कि अस्थिरता बेचैन करने लगी। परिणाम यह हुआ कि मैं टूटने लगी – मित्रों से दूर रहने लगी। एक शाम सुनने को मिला कि कार एक्सीडेंट में शेखर वालिया की म्रत्यु हो गयी है।“

“ओह ! तुम्हें तो बहुत कष्ट पहुंचा होगा, यह दु:खद समाचार सुन कर”, सुनील की बात में व्यंग्य का पुट स्पष्ट था। “और हाँ, राजीव तो तुम्हारा फ़ैन था न? मुक्ता के साथ कैसे कर दी उसकी शादी?”

सुनील का प्रश्न सुन नीला कई क्षणों तक चुप रही फिर धीरे से बोली, “तुम क्या विश्वास कर लोगे मेरी बातों पर? ख़ैर, मैं नहीं जानती थी कि वह छ्दमवेशी एक साथ हम दोनो बहनों के साथ प्यार का स्वांग कर रहा है। बात तो तब जा कर खुली, जब एक रात मुक्ता घबराई हुई मेरे पास पहुंची। रोते-रोते उसकी हिचकी बंध गयी थी। जो कुछ भी मुझ से उसने कहा, वह मेरे लिये विष बुझे बाण से कम नहीं था, जिसे सुन कर मैं जड़ हो गयी थी। मुक्ता गर्भवती थी। उसे बचाने का सर्वोत्तम उपाय यह शादी थी। आज वह एक बच्चे की माँ है। किंतु स्वास्थय ठीक नहीं रहता। उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए अक्सर मुझे उसके यहाँ जाना पड़ता है। राजीव और मुक्ता मुझे बहुत मानते हैं।“ इतना कह कर नीला चुप हो गयी। अब तक वह काफ़ी थक चुकी थी। उठ कर बाथरूम तक गयी। लगभग दस मिनट पश्चात जब लौटी तो हाथ-मुँह धो कर तरो-ताज़ा दिखायी दे रही थी। अपने स्थान पर बैठते ही वह पुन: बोली, “ सच सुनील, किसी के भाग्य में क्या लिखा होता है, यह वह स्वयं नहीं जानता और यहीं आ कर मानव अपने आप को बहुत बौना महसूस करने लगता है।“

फिर कुछ सोच कर, “जो भी हो, समय परिवर्तनशील है न, उसके साथ-साथ मानव मन, उसकी प्रतिक्रिया भी तो बदल सकती है, क्या तुम ऐसा नहीं सोचते?”
“क्यों नहीं, ऐसा हो सकता है।“
“तो सुनील, मुझे क्षमा कर दो, उस अतीत को, उन वर्षों को, जो कटुता, दु:ख और क्षोभ के अतिरिक्त तुम्हें कुछ नहीं दे सके। मुझे अपना लो सुनील, मुझे बचा लो।“ भावुकता के वशीभूत हो वह सुनील के कंधे से जा लगी। “सुनील, डीयर सुनील, तुम्हीं मेरी पहली और अन्तिम उपलब्धि हो, अब तुम्हें मुझ से कोई शिकायत नहीं होगी, सच सुनील, मैं वायदा करती हूँ।“

रूंधे गले से जाने कब तक वह क्या कुछ बोलती रही और वह अनजाने ही उसका सिर सहलाता रहा।

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं, माई डीयर नीलू, सच ही तुम बहुत बदल गयी हो। अब हम एक दूसरे के प्रति पूर्णत: समर्पित हो सकते हैं। कहते-कहते उसने नीला की नाक पकड़ कर हल्के हाथों से उसके गालों को थपक दिया। एक पल को वह चौंकी, शर्मायी और फिर अनायास हँस पड़ी – “ओह! नाटी ब्वाय, तुम्हारी नाक पकड़ने की पुरानी आदत अभी तक गयी नहीं।“

बहुत देर तक दोनों साथ-साथ हंसते रहे किंतु यह हँसी उसके अन्तर्मन से समझौता नहीं कर पा रही थी। रह-रह कर कानों में नीला के स्वर झनझना उठत्ते थे…हाँ…हुई तो…अपने राजीव के साथ्…राजीव्…अपना राजीव्…अपना राजीव्…

सहसा वह उठ खड़ा हुआ, “अरे क्या हुआ?”, नीला चौंकती सी बोली।
“कुछ भी तो नहीं”, वह स्वयं को संभालता सा बोला।
“ओह! मैं तो घबरा ही रही थी, अच्छा सुनो, अब दिल्ली पहुँच कर मेरे पास ही रूकना, फिर चाहोगे तो साथ-साथ लखनऊ चलेंगे। क्यों ठीक है न?”
“हाँ, हाँ एसा ही करेंगे”, फिर खिड़की से बाहर झाँकते हुए बोला – “लगता है, मुरादाबाद आ गया। कुछ खाने को ले आऊँ। बड़े ज़ोरों की भूख लग रही है, तुम्हें भी तो लगी होगी न्। अच्छा देखो, घबराना नहीं, मैं अभी आया”, कहते-कहते वह झटक से नीचे उतर गया। माथा फटा जा रहा था। डिब्बे से कुछ ही दूरी के फ़ासले पर एक खंबे की ओट ले कर वह खड़ा हो गया। नीला डिब्बे के बाहर मुँह निकाल कर उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रही थी। वही पाँच वर्ष पूर्व वाला सलोना चेहरा, वही हंसी और वैसा ही मोहक निमंत्रण्…पर किसे…किसे…और किसे……?”

गाड़ी ने सीटी दे दी, वह यंत्रवत वहीं खड़ा रहा, द्रष्टि नीला पर ही टिकी रही। वह बहुत बेचैन दिख रही थी। चंचल आँखें दूर-दूर तक उसी को ढूँढ रही थीं। तभी एक शब्द उसके कानों से टकराया……सु……नी……ल

चाह कर भी वह उत्तर न दे सका। गाड़ी धीरे-धीरे सरकते हुए नज़रों से ओझल हो गयी। वह वहीं खंबे की ओट लेकर सिगरेट के लंबे-लंबे कश खींचता रहा, धुएं के बनते-बिगड़ते छल्लों को गिनता रहा जो एक के बाद एक बनते चले जाते हैं, अतीत और वर्तमान के उन संधिपत्रों की तरह, जिन पर वह हस्ताक्षर नहीं कर पाया।
अहस्ताक्षरित संधिपत्र (Short Stories), इतिहास शोध-संस्थान, नयी दिल्ली, 1994, प. 156-165
भाषा विभाग, पंजाब, द्वारा प्रदत्त वित्तीय सहायता से प्रकाशित