Monday, September 24, 2007

ॠण-ग्रस्त: अंतिम भाग



वे नवंबर-दिसंबर के ठिठुरते हुए दिन थे जब मीना रात-रात भर माँ के सरहाने बैठी रहती थी। उन दिनों माँ का चलना-फिरना समाप्त्प्राय हो गया था। वह बिस्तर पर ही मल-मूत्र त्याग देती थीं लेटे-लेटे उनके शरीर पर घाव हो गये थे, जिन्हें मीना बड़े प्रेम से साफ़ करती। हर आधे घंटे में पाऊडर छिड़कती। माँ को नहलाना-धुलाना, गंदगी साफ़ करना कोई आसान काम नहीं था। धन्य थी वह, जिसने अपनों से भी बढ़ कर माँ की सेवा की।

आज रात दो बजे माँ ने प्राण त्याग दिये। तब से सुगंधा उदास, चुपचाप माँ के घुटनों के पास बैठी है। तभी डा. सक्सेना ने तंद्रा भंग की – “डा. सुगंधा, मेरे विचार से अब बहुत देर हो गयी है। शव को अधिक समय घर में नहीं रखना चाहिये। आपके रिश्तेदार तो अब तक पहुंचे नहीं। हमें चाहिये, हम माँ का अंतिम संस्कार कर दें।”

उसने सोचा अब किसी के आने या न आने से क्या फ़र्क पड़ता है। बोझिल कदमों से वह उठ खड़ी हुई और बोली – “चलिये डाक्टर साहब, माँ को ले चलें।”

वही शम्शान घाट जहाँ पिछले वर्ष ही तो अविनाश का संस्कार हुआ था। तब माँ थी, जिसकी छाती से लग कर वह फूट-फूट कर रोई थी। पर आज ऐसा कौन है जो रिसते हुए घावों को सहला सके।

माँ के अंतिम संस्कार से लौटी तो भाई-भाभी, जीजा जी, मेघा और अन्य रिश्तेदार पहुंच चुके थे। सभी उसे देख कर बिलख-बिलख कर रो पड़े। पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा, न रोई, न कुछ बोली। जाने कब तक शून्य में आँखें गड़ाये चुपचाप बैठी रही। उसकी अपनी तो बस एक माँ ही थी जो इस समय घर से बहुत दूर, धरती माँ की गोद में शाँत अकेली सोई हुई थी। शेष सब व्यर्थ है, दिखावा मात्र, उसका अन्तर्मन उसे कह रहा था।

प्यास से उसका गला सूख रहा था। उसने मीना को आवाज़ लगाई। शम्शान घाट जाने से पूर्व वह उसे कुछ आवश्यक निर्देश दे कर घर पर ही छोड़ गयी थी। पर अब वह कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। साथ वाले कमरे में गयी तो गोदरेज की अल्मारी खुली पड़ी थी। उसने झटपट ड्राअर खोली तो सभी पैसे, उसकी सोने की चेन और बालियाँ नादारद थीं, जिन्हें व्यस्तता के कारण वह अल्मारी की ड्राअर में रख कर भूल गयी थी। अब स्थिति उसके सामने स्पष्ट हो चली थी कि मीना ने ही ये सब चीज़ें उठाई होंगी क्योंकि उसके घर की कोई वस्तु तथा उसके रखने का स्थान मीना से छिपा नहीं रह गया था। वह घर के सदस्य के समान ही पिछले चार महीने से उसके घर में रहती रही थी और सुगंधा को उस पर पूरा विश्वास हो गया था।

अब तक कई अन्य लोग भी पीछे-पीछे कमरे में आ गये थे। बड़े भैया ने कहा कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिये क्योंकि मीना और उसका पति शहर से बाहर नहीं जा पाये होंगे।

सुगंधा की आँखों के सामने विगत वर्ष के वह सब दिन चरखी की तरह घूमने लगे जब माँ की संतान होने का कर्तव्य उनकी चारों संतानों को किसी न किसी कारण से, किसी न किसी क्षण एक बोझ प्रतीत हुआ। उस समय मीना ने माँ की अथक सेवा शुश्रूशा की। हाँ, पगार ले कर की, पर यही तो उसका कर्तव्य था। आज के स्वार्थी परिवेश में, जहां कोई नर्स अथवा सेवक पैसे ले कर भी, नाक-मुँह चढ़ा कर, केवल नाम-मात्र सेवा कर के चलते बनते हैं, मीना ने बड़ी लगन और नियमित रूप से, बिना माथे पर शिकन डाले, माँ को संभाले रखा। ऐसा तो स्वयं सुगंधा भी नहीं कर पाई थी।

उसने पल भर को भाई की आँखों में झाँका, फिर धीरे से बोली – “जाने दो भैया, जाने दो उसे। जिस लगन, प्रेम और अपनेपन से उसने हमारी माँ की सेवा की है, वह अकथनीय है। उसने जीवन के उस कठिन मोड़ पर, जब मैं नितांत अकेली रह गयी थी, माँ के हारे हुए तन और मेरे दुखी मन को सांत्वना एवं सहारे के अमृत से सींचा। दस-बीस हज़ार तो क्या, वह मेरा सर्वस्व भी ले जाती तो भी मैं आजीवन उसकी ॠणी रहती।”

सुगंधा जानती थी कि मीना का ॠण किसी भी अर्थ-शास्त्र के परे था और उसकी चोरी भले ही हर मानव निर्मित न्यायलय में दंडनीय हो, सुगंधा के ॠण-ग्रस्त हृदय में केवल आभार था, न्याय और दंड की हर दलील, हर दायरे के बाहर।

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