Saturday, October 13, 2007

चाँदनी




चाँदनी रात-रानी सी खिलती गयी,
चंचल कस्तूरी-मृग सी मचलती गयी।
पत्ते-पत्ते पे हिम सी फिसलती गयी,
रात भर बन के चंदन महकती रही,
एक स्वप्निल झरोखे सी जगती रही।


चंद्रबाला धवल भावना की परी,
जाहनवी सी सरल कामना बन झरी।
बाँध लेती मधुर रेशमी वल्लरी,
झूमती हर दिशा में दमकती रही,
दीप्त मुक्तामणी सी विहँसती रही।


श्वेत मोदित लहर गुनगुनाती हुई,
ताल दर्पण में वह झिलमिलाती हुई।
कांत उपवन बनी महमहाती हुई,
रात में झीना आँचल फैलाती रही,
गीत मीठे सुरों के सुनाती रही।


नयन कोरों को अमृत से भर जाती थी,
देखते मेघ शावक को डर जाती थी।
फिर जो चुपके से मेरी सखी बन गयी,
प्रात: होने से पहले दगा दे गयी,
कौतुहल मेरा छल कर सज़ा दे गयी।


चाँदनी रात-रानी सी खिलती गयी,
चंचल कस्तूरी-मृग सी मचलती गयी।
पत्ते-पत्ते पे हिम सी फिसलती गयी,
रात भर बन के चंदन महकती रही,
एक स्वप्निल झरोखे सी जगती रही।


"चेतना के स्वर", प.63



Monday, September 24, 2007

ॠण-ग्रस्त



Story copyright: Sukirti Bhatnagar

Story source: "अहस्ताक्षरित संधिपत्र": A Compilation of Stories, 1994

भाग 1

भाग 2

भाग 3

ॠण-ग्रस्त: अंतिम भाग



वे नवंबर-दिसंबर के ठिठुरते हुए दिन थे जब मीना रात-रात भर माँ के सरहाने बैठी रहती थी। उन दिनों माँ का चलना-फिरना समाप्त्प्राय हो गया था। वह बिस्तर पर ही मल-मूत्र त्याग देती थीं लेटे-लेटे उनके शरीर पर घाव हो गये थे, जिन्हें मीना बड़े प्रेम से साफ़ करती। हर आधे घंटे में पाऊडर छिड़कती। माँ को नहलाना-धुलाना, गंदगी साफ़ करना कोई आसान काम नहीं था। धन्य थी वह, जिसने अपनों से भी बढ़ कर माँ की सेवा की।

आज रात दो बजे माँ ने प्राण त्याग दिये। तब से सुगंधा उदास, चुपचाप माँ के घुटनों के पास बैठी है। तभी डा. सक्सेना ने तंद्रा भंग की – “डा. सुगंधा, मेरे विचार से अब बहुत देर हो गयी है। शव को अधिक समय घर में नहीं रखना चाहिये। आपके रिश्तेदार तो अब तक पहुंचे नहीं। हमें चाहिये, हम माँ का अंतिम संस्कार कर दें।”

उसने सोचा अब किसी के आने या न आने से क्या फ़र्क पड़ता है। बोझिल कदमों से वह उठ खड़ी हुई और बोली – “चलिये डाक्टर साहब, माँ को ले चलें।”

वही शम्शान घाट जहाँ पिछले वर्ष ही तो अविनाश का संस्कार हुआ था। तब माँ थी, जिसकी छाती से लग कर वह फूट-फूट कर रोई थी। पर आज ऐसा कौन है जो रिसते हुए घावों को सहला सके।

माँ के अंतिम संस्कार से लौटी तो भाई-भाभी, जीजा जी, मेघा और अन्य रिश्तेदार पहुंच चुके थे। सभी उसे देख कर बिलख-बिलख कर रो पड़े। पर उसने किसी से कुछ नहीं कहा, न रोई, न कुछ बोली। जाने कब तक शून्य में आँखें गड़ाये चुपचाप बैठी रही। उसकी अपनी तो बस एक माँ ही थी जो इस समय घर से बहुत दूर, धरती माँ की गोद में शाँत अकेली सोई हुई थी। शेष सब व्यर्थ है, दिखावा मात्र, उसका अन्तर्मन उसे कह रहा था।

प्यास से उसका गला सूख रहा था। उसने मीना को आवाज़ लगाई। शम्शान घाट जाने से पूर्व वह उसे कुछ आवश्यक निर्देश दे कर घर पर ही छोड़ गयी थी। पर अब वह कहीं भी दिखाई नहीं दे रही थी। साथ वाले कमरे में गयी तो गोदरेज की अल्मारी खुली पड़ी थी। उसने झटपट ड्राअर खोली तो सभी पैसे, उसकी सोने की चेन और बालियाँ नादारद थीं, जिन्हें व्यस्तता के कारण वह अल्मारी की ड्राअर में रख कर भूल गयी थी। अब स्थिति उसके सामने स्पष्ट हो चली थी कि मीना ने ही ये सब चीज़ें उठाई होंगी क्योंकि उसके घर की कोई वस्तु तथा उसके रखने का स्थान मीना से छिपा नहीं रह गया था। वह घर के सदस्य के समान ही पिछले चार महीने से उसके घर में रहती रही थी और सुगंधा को उस पर पूरा विश्वास हो गया था।

अब तक कई अन्य लोग भी पीछे-पीछे कमरे में आ गये थे। बड़े भैया ने कहा कि पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिये क्योंकि मीना और उसका पति शहर से बाहर नहीं जा पाये होंगे।

सुगंधा की आँखों के सामने विगत वर्ष के वह सब दिन चरखी की तरह घूमने लगे जब माँ की संतान होने का कर्तव्य उनकी चारों संतानों को किसी न किसी कारण से, किसी न किसी क्षण एक बोझ प्रतीत हुआ। उस समय मीना ने माँ की अथक सेवा शुश्रूशा की। हाँ, पगार ले कर की, पर यही तो उसका कर्तव्य था। आज के स्वार्थी परिवेश में, जहां कोई नर्स अथवा सेवक पैसे ले कर भी, नाक-मुँह चढ़ा कर, केवल नाम-मात्र सेवा कर के चलते बनते हैं, मीना ने बड़ी लगन और नियमित रूप से, बिना माथे पर शिकन डाले, माँ को संभाले रखा। ऐसा तो स्वयं सुगंधा भी नहीं कर पाई थी।

उसने पल भर को भाई की आँखों में झाँका, फिर धीरे से बोली – “जाने दो भैया, जाने दो उसे। जिस लगन, प्रेम और अपनेपन से उसने हमारी माँ की सेवा की है, वह अकथनीय है। उसने जीवन के उस कठिन मोड़ पर, जब मैं नितांत अकेली रह गयी थी, माँ के हारे हुए तन और मेरे दुखी मन को सांत्वना एवं सहारे के अमृत से सींचा। दस-बीस हज़ार तो क्या, वह मेरा सर्वस्व भी ले जाती तो भी मैं आजीवन उसकी ॠणी रहती।”

सुगंधा जानती थी कि मीना का ॠण किसी भी अर्थ-शास्त्र के परे था और उसकी चोरी भले ही हर मानव निर्मित न्यायलय में दंडनीय हो, सुगंधा के ॠण-ग्रस्त हृदय में केवल आभार था, न्याय और दंड की हर दलील, हर दायरे के बाहर।

ॠण-ग्रस्त: भाग 2



अविनाश की मृत्यु के समय दोनो भाई, भाभियां, मेघा……सभी आये थे। मेघा पूरे दो महीने रही थी उसके पास। उसी दौरान उसने सुगंधा से माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में बात भी की थी – “सुगंधा, लगता है माँ कुछ ठीक नहीं हैं, कुछ भी तो खाती, पीती नहीं, दिनों दिन कमज़ोर होती जा रहीं हैं।”

“नहीं दीदी, तुम्हें वहम हो गया है। बुढ़ापा है, ऊपर से मेरा दुख क्या कम है उन्हें। बस इसीलिये कुछ खाने पीने को जी नहीं चाहता होगा” – सुगंधा ने लापरवाही से कहा था। जब तक मेघा रही थी, उसने माँ, सुगंधा और नन्ही शिखा का पूरा-पूरा ध्यान रखा था। पर उसके वापिस लौट जाने के बाद घर भर में गहन उदासी फैल गयी थी। भले ही माँ ऊपर से कितनी सहज और शांत दिखाई देती रहीं हों, किंतु अंदर ही अंदर वह घुटती रहती थीं, रोती रहती थीं। आख़िर वह एक माँ थीं और बेटी की अन्तरव्यथा को उनसे अधिक और कौन समझ सकता था। जाने कब से उनके पेट में हल्का-हल्का दर्द रहने लगा था किंतु सुगंधा की व्यस्तता और उसकी अन्य अनेक प्रकार की चिन्ताओं की बात सोच कर वह हमेशा चुप रह जातीं और अपने कष्ट की बात उससे कभी नहीं करतीं थीं। पर आखिर कब तक? अंदर ही अंदर बिमारी ने उग्र रूप धारण कर लिया था। बाद में पूरा चेक-अप करवाने के बाद पता चला कि उन्हें लीवर का कैंसर हो गया था जो अपनी आख़िरी स्टेज पर था। डाक्टर ने बताया कि उनके जीवन के मात्र दो-तीन महीने ही शेष रह गये हैं।

कैसी बौराई सी देखती रह गयी थी सुगंधा माँ को। तब उसे पहली बार माँ का चेहरा बहुत कमज़ोर दिखाई देने लगा था। गाल अंदर को धँस गये थे। आँखों के नीचे काले घेरे उभर आये थे और सारा शरीर झुर्रियों से भर गया था। मेघा तो पहले ही सचेत कर गयी थी पर वह ही कहाँ ध्यान दे पायी थी माँ की ओर। सारा दोष उसका है, केवल उसका। ऐसा मान, जाने कितने दिनों तक वह अंदर ही अंदर छटपटाती रही थी, हताहत होती रही थी। फिर उसके बाद शुरु हुआ था अस्पताल, डाक्टर, दवाइयों और टेस्ट का लंबा सिलसिला।

माँ अक्सर खोई-खोई आँखों से उसकी ओर निहारा करती थीं। एक रात उसके बाल सहलाते हुए बोलीं, “मैं जानती थी कि मुझे कैंसर है पर इसमें इतना घबराने वाली क्या बात है। हर किसी को कभी न कभी, किसी न किसी तरह इस संसार से विदा लेना है। समझो कि मेरा भी अंत समय अब निकट आ गया है। बस एक ही चिंता है कि मेरे बाद तुम्हारा क्या होगा?” कैसी काली घटाऐं उमड़ आई थीं माँ की धुंधली हो आई पनीली आँखों में। इसके बाद उनकी हालत दिन पर दिन ख़राब होती गयी थी।

दोनों भाई, भाभियां पहुंचे थे माँ को अपने साथ लिवा ले जाने के लिये। माँ भी उनके साथ जाने को तैयार थी पर सुगंधा उन्हें कहीं भी किसी के भी पास नहीं भेजना चाहती थी। कई रातें वह अच्छी तरह सो नहीं पाई थी। रह-रह कर दोनो भाभियों का व्यक्तित्व उसके सम्मुख उजागर हो उठता था। छोटी भाभी, जो मुंबई में रहती थी, अपने दो साल के बेटे अंकुर को क्रैच में छोड़कर जाती थी। वैसे भी उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं रहता था। वह भला माँ को कैसे संभाल पायेगी। और बड़ी भाभी, उसके चार छोटे-छोटे बच्चे थे। उन्हें तैयार करना, स्कूल भेजना, उस पर घर के ढेरों काम थे करने के लिये। वैसे भी वह माँ को उतना सम्मान कभी नहीं दे पायी जितना उसे देना चाहिये था। उसके पास रह कर, बीमार और पूर्णत: उस पर आश्रित माँ के स्वाभिमान को ज़रा सी भी ठेस पहुंची तो वह और अधिक सहन नहीं कर पायेंगी। दूसरी तर्कसंगत बात यह भी उसके ध्यान में आई कि वह स्वयं डाक्टर है। इसके अतिरिक्त अस्पताल के दूसरे डाक्टर हर समय माँ की देखरेख में लगे रहते हैं। बहुत सोच विचार के बाद उसने माँ को अपने पास ही रखने का अंतिम निर्णय ले लिया और भाइयों को उससे अवगत करा दिया। इस विषय में भाइयों ने भी अधिक तर्क नहीं किया और दो-चार दिन बाद ही अपनी-अपनी नौकरियों और बच्चों के स्कूल की बात कह कर भाभियों सहित वापिस चले गये।

मेघा भी तुरंत चली आयी थी। उन दिनों माँ कुछ खाती पीती नहीं थीं। बस इंजेक्शन के सहारे ही ख़ुराक उनके अंदर पहुंचाई जाती थी। फिर भी मरीज़ के हज़ारों काम होते हैं जिन्हें बड़े धैर्य से करना पड़ता है और मेघा ने वे सब अच्छी तरह संभाल लिये थे। किंतु मेघा भी अधिक समय कहां रह पायी सुगंधा के पास। उसकी सासु-माँ बाथरूम में फिसल कर गिर पड़ीं और मेघा को बेबस हो कर लौटना पड़ा।

सुगंधा एक बार फिर ज़िम्मेदारियों और परेशानियों के साथ अकेली रह गयी थी। कभी-कभी उसका मन विद्रोही हो उठता था। वह सोचती, क्या माँ को संभालने की, सेवा करने की ज़िम्मेवारी केवल उसकी है? क्या औरों का माँ के प्रति कोई कर्तव्य नहीं? किंतु दूसरे ही पल वह स्वयं को कोसने लगती। आख़िर वह किसी दूसरे को दोष क्यों दे? उसने स्वयं ही तो माँ को संभालने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली थी और ऐसा कर के कोई एहसान तो नहीं किया उसने माँ या किसी और पर। यह चारपाई पर पड़ी हुई मजबूर, बीमार औरत उसकी माँ है। उसकी अपनी माँ, जिसने हर दिन, हर रात केवल उसके सुख की, उसकी हँसी-ख़ुशी की बात सोची। अपने को भूल कर केवल उसके दु:ख-सुख में खो जाने की कोशिश की थी। फिर आज उस माँ के प्रति निष्ठावान होने के स्थान पर वह हताश क्यों हो रही है।

इंसान का अपना मन ही उसका सब से बड़ा शत्रु भी है और मित्र भी। बस सोचने का ढंग सही होना चाहिये। एक बार फिर सुगंधा ने ऐसी कठिन परिस्थितियों में अपने आप को संभाल लिया था और किसी और पर आश्रित होने के स्थान पर स्वयं माँ की हर संभव सेवा का दृढ़ निर्णय ले लिया। भाग्य से उन्हीं दिनों, उसे एक पढ़ी-लिखी कुशल काम वाली मिल गयी। देखने में सौम्य और शालीन लगती थी। शीघ्र ही अपनी कार्यकुशलता से उसने सुगंधा का मन जीत लिया। तब सुगंधा ने उसे और उसके पति को घर का सर्वेंट-क्वार्टर रहने के लिये दे दिया था। उसका पति घर का सब काम करने लगा था और नौकरानी मीना ने माँ का सारा काम अपने ऊपर ले लिया था।

Sunday, September 23, 2007

ॠण-ग्रस्त: भाग 1



वह माँ ही थी जिसे सुगंधा जब जी चाहे नि:संकोच अपने पास बुला लेती थी, कभी अपने अकेलेपन के कारण तो कभी नन्हीं सी बच्ची की देखरेख के लिये। तीन वर्ष पूर्व जब पति अविनाश साल भर के लिये अमेरिका चले गये थे और सुगंधा की सासु-माँ को भी किसी कारणवश अपने मँझले बेटे के पास जाना पड़ा था, तब तत्काल सुगंधा ने माँ को बुला भेजा था। पूरे छः महीने रही थी माँ उसके पास।

कैसा स्नेहिल और दीप्तिमय व्यक्तित्व था माँ का। कुछ ही दिनों में कैसी घुल-मिल गयी थीं वह सबसे। सुगंधा डाक्टर थी। दिन भर की थकी-माँदी जब घर लौटती तो माँ को फाटक के पास ही खड़ा पाती। उसे लगता, वह उसकी माँ नहीं, एक शीतल, स्फ़ुर्तिदायक मेघखंड है जो उसके थके हुए तन और मन को अपार शांति और तृप्ति से भर देता है। नन्हीं शिखा की देखरेख, सुगंधा की घर-गृहस्थी की संभाल, सभी कुछ माँ ही करती थीं। घर का छोटा-मोटा सामान भी वह स्वयं ही पास वाली दुकानों से ख़रीद लाती थीं। छ: मास देखते ही देखते व्यतीत हो गये थे। अविनाश के अमेरिका से लौट आने के कुछ दिन बाद ही माँ वापिस दिल्ली चली गयी थीं।

ऐसा नहीं था कि उनके और कोई संतान नहीं थी। बड़ी बेटी मेघा अपने परिवार सहित बनारस में रहती थी। दोनों बेटों में से छोटा बेटा अनिल मुंबई में इंजीनियर था और बड़ा बेटा सुनील दिल्ली में वकालत करता था। माँ उसी के पास रहती थीं। पति का स्वर्गवास तो वर्षों पूर्व ही हो गया था। अब तो बस बच्चों का मुँह देख कर ही जीती थीं।

पिछले वर्ष भी तो वह सुगंधा के पास लखनऊ गई थीं। कैसे साधिकार बुला भेजा था सुगंधा ने उन्हें –
“माँ, अविनाश शायद दो सप्ताह के लिये जापान जायेंगे, शिखा और मेरा मन आपके बिना नहीं लगता, बस चिट्ठी मिलते ही चली आना”।

माँ चली आयीं थी फिर, पर कैसा आना था वह? अविनाश जापान तो नहीं जा सके, हाँ, माँ के पहुंचने के तीसरे दिन ही एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गयी। हाहाकार मच गया था घर भर में। हृदय के मानों टुकड़े-टुकड़े हो गये थे। बसंती रंग बिखर कर आग के अंगारे बन गये थे। सुगंधा तो मानों जड़ हो गयी थी। उसके सामने तो रेगिस्तान से तपते जीवन का नितान्त अकेला लंबा सफ़र शेष रह गया था। फिर माँ वापिस नहीं लौटी थीं। लौटतीं भी कैसे, किसके सहारे छोड़ आती सुगंधा को।

जाने वाले को क्या कभी भुलाया जा सकता है? यादें तो मन के किसी अछूते कोने में हर पल दीपशिखा सी प्रज्वलित रहती हैं। किंतु जीवन कल्पना और यादों के सहारे नहीं कटा करता। जीने के लिये यथार्थ के कटु सत्य को स्वीकरना ही पड़ता है। सुगंधा ने भी अपनी नियति से समझौता कर लिया था। भरा-पूरा ससुराल था सुगंधा का किंतु पति की मृत्यु के उपरांत प्राय: सभी ने उससे नाता तोड़ लिया था।

घर के काम तो माँ संभाल लेती थीं किंतु कुछ काम ऐसे थे जो उसे स्वयं ही करने थे। अविनाश के प्राविडेंट फ़ंड और जायदाद संबधी व्यवस्थाओं के लिये उसे अकेले ही कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते। इसी तरह के और कई कार्यों में बहुत व्यस्त हो गयी सुगंधा। न उसे घर का ध्यान रहा, न शिखा का और न माँ का।

अपने एकांतिक क्षणों में वह हर पल यह अनुभव करती कि इतने बड़े संसार में केवल माँ ही उसकी अपनी है जिसके सहारे उसे जीवन काटना है। वास्तव में यह माँ की अपार ममता ही थी जो उसकी कार्यक्षमता को बढ़ाती थी, उसे संरक्षण प्रदान करती थी। सघन वट-वृक्ष की घनेरी छाया सा माँ का प्यार ही उसे टूटने से, बिखरने से बचाये हुए था।

किंतु आज वही माँ नहीं रहीं। उनका निर्जीव शरीर सफ़ेद चादर से ढका धरती पर पड़ा था। उनके दोनो निर्जीव हाथ छाती पर टिके हुए थे। वे हाथ जो अब कभी सुगंधा का सिर सहलाने को नहीं उठेंगे, वे बंद आँखें जो अब कभी उसके क्लांत तन-मन को संतोष प्रदान नहीं कर पायेंगी।

माँ चली गयी…माँ क्यों चली गयी? उन्होनें तो उसका साथ निभाने का वायदा किया था। माँ के पैरों के पास बैठी वह विचारों के तानों बानों में उलझी हुई थी। सहसा बिलख-बिलख कर रो पड़ी। तभी पास खड़े डा. गरेवाल ने उसके कंधे थपथपाते हुए कहा –

“Sugandha, you are a brave girl. You should not lose heart and face the tragedy boldly”

वह चुपचाप आँखें पोंछने लगी। तभी उसके सहकर्मी त्रिपाठी जी ने बताया कि उसने उसके सभी संबंधियों को तार डाल दिये हैं। धीरे-धीरे घर जान-पहचान वालों से भरता जा रहा था। पर सबसे बेख़बर एक बार फिर वह अपने अतीत में खो गयी।

"अहस्ताक्षरित- संधिपत्र", इतिहास शोध-संस्थान, नयी दिल्ली, 1994, प. 148-155

Friday, September 21, 2007

हम लड़कियां



"बेटी, ज़रा यह पतीला तो उठा दे नीचे से", कमर के दर्द से परेशान हो, मैने पास खड़ी धन्वी से कहा तो उसने पतीला मुझे पकड़ा दिया।

"कुछ और काम बताओ न दादी"

"लो, यह धनिया पत्ती साफ़ कर दो।"

कुर्सी पर बैठे-बैठे ही वह अपने नन्हें-नन्हें हाथों से धनिया की पत्ती को डंडियों से अलग कर कटोरी में रखने लगी। इस बीच मैने दाल-सब्ज़ी बना ली, फिर उसे नहला-धुला कर तैयार कर दिया तो देखा दोपहर का एक बज चुका है।

"अब तो खाना खाने का समय हो गया न दादी?"

"हाँ बेटी, तुम जा कर अपने पापा और दादा जी को बुला लाओ"

वह दौड़ती हुई कमरे में चली गयी।

"पापा उठो, खाना खा लो, दादा जी उठो, खाना खाओ। ये कोई सोने का टाइम है?"

इतना कह वापिस आ वह एक पटड़े पर खड़ी हो गई और रोटी बेलने की ज़िद करने लगी। सहसा उसके हाथ रुक गये।

"दादी, पापा और दादा जी तो बस आराम ही करते रहते हैं। घर का सारा काम तो मुझे और आपको ही करना पड़ता है, ऐसा क्यों?" उसकी भोली आँखों में ढेरों प्रश्न थे।

"बेटी, तुम्हारे दादा जी की कमर में बहुत दर्द रहता है, तभी तो लेटे रहते हैं और……", मेरी बात पूरी होने से पहले ही वह बोल पड़ी, " पर दादी, कमर में तो आपके भी बहुत दर्द रहता है, लेकिन आप……"

एकाएक वह चुप हो गयी। फिर धीरे से बोली, "हम करें भी तो क्या करें, लड़कियां जो हैं। आप भी लड़की, मैं भी लड़की। घर का काम तो हमें ही करना है।"

ऐसा कह वह फिर से टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां बेलने लगी और मैं पनियाली आँखों से उसे देखती रह गयी, जिसे केवल पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही अपने लड़की होने के अर्थ का आभास होने लगा था।

"समय का दर्पण", सुकीर्ति प्रकाशन, प. 24

Sunday, September 16, 2007

चलो गले मिल जाओ



धर्मान्धता की कट्टर
सीमा को तोड़ दो।
कैसा यह अलगाव दिलों का
इसको छोड़ दो।।

मंदिर पर प्रहार हुआ तो,
हिंदु मन क्यों भटका?
गुरुद्वारा जलता देखा तो,
सिक्ख भाई क्यों भड़का?

नहीं खुदा मस्जिद में रहता,
न वाहिगुरू गुरूद्वारे में।
नहीं मसीहा गिरिजाघर में,
देव न देवीद्वारे में।।

जहाँ प्रेम और त्याग, अहिंसा,
सेवा का वहीं निर्झर है।
मानवता हो लक्ष्य जहाँ का,
वहीं ईश्वर का घर है॥

ज्यों प्रकाश धरा को देते,
उज्जवल चांद सितारे।
सत्य धर्म भी सदा सिखाये,
कर्म करो उजियारे॥

मानव निर्मित मंदिर मस्जिद,
फिर से बन जायेंगे।
बिछड़ गए जो भाई-भाई,
फिर कैसे मिल पायेंगे॥

अपने ही हाथों मत काटो,
अपने ही अंगों को।
हा ! विषाक्त क्यों करते जाते,
सुख स्वपनिल इन रंगों को॥

आओ भाईयो साथ चलें हम,
ऐसी विषम घड़ी में।
बिखरे मोती गुँथ जायेंगे,
फिर से एक लड़ी में॥

दुखियारी माता के आँसू,
मिल कर हम पोंछेंगे।
हर अग्नि को शांत करेंगे,
प्रगति का हम सोचेंगे॥

जात-पात के भेद मिटा दो,
सब हैं भारत वासी।
अब न अपने ही घर में हों,
राम पुन: बनवासी॥

बालक हों या युवा नागरिक,
सब को यह समझाओ।
सब अपने ही संगी साथी,
नफ़रत दूर भगाओ॥

हिंसा की चिंगारी त्यागो,
मन की शक्ति बढ़ाओ।
नहीं कोई बेगाना हम में,
चलो गले मिल जाओ॥

"चेतना के स्वर", हिंदी भाषा सम्मेलन, . ४०- ४१